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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

कुम्भ मेला और साधु संत

बारह वर्ष पश्चात प्रयाग का कुम्भ मेला एक बार फिर पुरे जोर शोर पर चल रहा है।मुझे तो प्रयाग छोड़े बहुत  दिन हो गया किन्तु आज भी बचपन की यादे बनी है।नित्य टी वी में दिखाया जाता है कुम्भ मेले  के बारे में एवं वहाँ आये साधू संतों के बारे में।
                              
                                     मैं  बचपन से आज तक यही विचार करती रही की ये सब योगी है या फिर भोगी और ढोगी?क्योंकि आप इनका आशियाना तो देखें किस चीज़ की कमी है?लोग कहते है की भारतीय अन्धविश्वासी होते हैं और इन साधुओं के मायाजाल में फंसते है।किन्तु अब आप देखिये इन साधुओं के जमावड़े में कितने विदेशी हैं।क्या ये अन्धविश्वासी नहीं हैं? लोग कहते हैं संतों की अवहेलना हम सब करते हैं किन्तु ये सत्य नहीं है।हम सभी उन संतों का आदर सम्मान आज भी करते  हैं जो धर्म सिखाते हैं।आज भी आस्था है धर्म में भी और शंकराचार्य  संत में भी।
                                 
    किन्तु अफ़सोस केवल ढोंगी साधू के लिए है।जो धूनी रमाये चिलम पीते नजर आते हैं।मेरे विचार से संत वही  हैं जो दुसरे का सोचे न कि अपने सुख सुविधा का,संत वहीँ हैं जो प्रत्येक धर्म को एक समान माने  न कि कोई एक धर्मको,क्योकि ईश्वर तो सर्वव्यापी है।सब धर्म में हैं।मैं  ऐसे ही संत को बार बार नमन करना चाहूंगी जो सत्य प्रिय हो,कटु  वचन न बोले,और मुखमंडल हमेशा कमल की भांति खिला  हो।
                   
                      ख़ैर इसका तो अंत नहीं है आज भी कुम्भ की आस्था है,एक पृथक नगर बन जाता है,कुम्भ मेले का नजारा  तो कभी भी नहीं भूलता।हमें स्वयं जागृत होना है एवम सही और गलत का फैसला स्वयम लेना है।बाकि कुम्भ मेला  में भी आस्था है, धर्म में भी पूर्ण विश्वास है।किन्तु भ्रष्ट साधुओं के लिए कोई  स्थान नहीं हैं। 

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

भार्तिहारी शतक

                                          नीति शतक

1. बुद्धिमान जन ईर्ष्या से ग्रस्त हैं, अधिकारी जन घमंड में चूर हैं, अन्य लोग अज्ञान से पीड़ित हैं,ऐसी दशा में समझदारी की बातें और ज्ञान सूक्तियाँ किनसे कहें?तभी तो उत्तम विचार  मन में ही गल सड़ जाते हैं।

2. अबोध को आसानी से समझाया जा सकता है,ज्ञानी को इशारा ही काफी है।अंशमात्र ज्ञान से ही जो स्वयम को परम ज्ञानी मान  बैठा है उस मनुष्य  को ब्रह्मा भी संतुष्ट नहीं कर सकता।

3. जब में थोडा समझदार हुआ तो हाथी की तरह घमंड में चूर रहने लगा।तब मेरा मन भ्रम से लिप्त हो गया की में तो सर्वज्ञ हूँ।जब बुद्धिमानों की संगती से थोड़ा -थोड़ा जानने के योग्य हुआ तब समझ आया की में निपट मूर्ख हूँ,और मेरा दर्प ज्वर के समान उतर गया।

4.आग को पानी से रोक जा सकता है,सूर्य की धूप  को छाते से ,मदमस्त हाथी को तीखे अंकुश से, रोग को औषधालय या औषध-संग्रह से और विष को भांति भांति के उपायों से रोका जा सकता है,शास्त्रों में वर्णित सभी रोगों का इलाज है परन्तु मूर्खों की कोई दावा नहीं है।

                             

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

माटी की कहानी





एक कुम्हार माटी  से चिलम बनाने जा रहा था। उसने चिलम का आकर  दिया।थोड़ी देर में उसने चिलम को बिगाड़ दिया।माटी  ने पुछा ,अरे कुम्हार तुमने चिलम अच्छी  बनाई फिर बिगाड़ क्यों दिया?कुम्हार ने कहा कि अरे माटी पहले मैं चिलम बनाने की सोच रहा था किन्तु मेरी मति बदली और अब मैं सुराही या फिर घड़ा बनाऊंगा।
                    
                              ये सुनकर माटी बोली,रे कुम्हार तेरी तो मति बदली मेरी तो जिंदगी ही बदल गयी।चिलम बनती तो स्वयं भी जलती और दूसरों को भी जलाती,अब सुराही बनूँगी तो स्वयम भी शीतल रहूँगी और दूसरों को भी शीतल रखूंगी।
                               

                                यदि जीवन में हम सभी सही फैसला लें तो हम स्वयम भी खुश रहेंगे एवं दूसरों को भी खुशियाँ दे सकेंगे।

भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग






1.  सम्यक दृष्टि (अन्धविश्वास एवम  भ्रम  से रहित )

2. सम्यक संकल्प (उच्च तथा बुद्धियुक्त )

3. सम्यक वचन (नम्र, उन्मुक्त, सत्यनिष्ठ )

4. सम्यक कर्मान्त (शांतिपूर्ण ,निष्ठापूर्ण,पवित्र )

5.सम्यक आजीव (किसी भी प्राणी को आघात या हनी न पहुँचाना )

6.सम्यक व्यायाम (आत्म-प्रशिक्षण एवम आत्मनिग्रह हेतु )

7. सम्यक स्मृति (सक्रिय सचेत मन )

8.सम्यक समाधि (जीवन की यथार्थता पर गहन ध्यान )

                       बुद्ध की आज्ञाएँ

1.हत्या न कर

2.चोरी न कर

3.व्यभिचार न कर

4.झूठ मत बोल

5.निंदा न कर

6.कर्कश न बोल

7.व्यर्थ बात मत कर

8.दूसरों की सम्पत्ति का लोभ  न  कर

9.घृणा न दिखा

10.सम्यक  रूप से विचार कर


                                 पुण्य कर्म


1.सत्य पात्र को दान कर

2.नैतिकता के नियमों का पालन करें

3.शुभ विचारों का अभ्यास और विकास करें

4.दूसरों की सेवा और देखभाल करें

5.मत पिता और बड़ों का सम्मान करें और उनकी सेवा करें

6.अपने पुन्य का दूसरों को दें

7.दूसरों के द्वारा दिए गये पुण्य को स्वीकार करें

8.सम्यकता के सिद्धांत का श्रवण करें

9.सम्यकता के सिद्धांत का प्रचार करें

 10.अपनी त्रुटियों का सुधार करें

                    

सोमवार, 3 सितंबर 2012

जीवन

जीवन एक चुनौती है, सामना करिये .
जीवन एक दुःख है,स्वीकार करिए।
जीवन एक कर्तव्य है, पूरा करिए।
जीवन एक खेल है,आराम से खेलिए।
जीवन  एक रहस्य है, इसे स्वयम सुलझाइए।
जीवन एक सुखद यात्रा है,इसे दिल से पूरा करिये।
जीवन एक सुअवसर है,इसका सदुपयोग कीजिये।
जीवन एक प्रतिज्ञा है,इसे निभाइए।
जीवन एक लक्ष्य है,इसे पूर्ण रूप से प्राप्त करिये।
जीवन एक सुगन्धित फूल है, इसकी खुशबु को विश्व में बिखेरिये।
जीवन आनन्द है,जीवन अनमोल है,जीवन बहुमूल्य मणि है,इसे तनाव,क्रोध,से बचाईये। 

सरल और कठिन

  • उपदेश देना सरल है,अमल करना कठिन है 
  • खर्च करना सरल है,कमाना कठिन है 
  • शत्रु बनाना सरल है, मित्र बनाना कठिन है 
  • विवाह करना सरल है ,निर्वाह करना कठिन है 
  • वचन देना सरल है, पालन करना कठिन है 
  • काम बिगाड़ना सरल है, काम बनाना कठिन है 
  • उधर देना सरल है ,वसूलना कठिन है 

रविवार, 2 सितंबर 2012

आप भी जानें

  • जो बिगड़ी बनाते हैं,उन्हें भगवान कहते हैं
  • जो मुसीबत में  काम आते है,उन्हें इन्सान कहते है
  • जो रिझाता है भगवन को ,उसे गान कहते 
  • जो दिल में रखता है राम को, उन्हें हनुमान कहते है 
  • जो पीता है जहर को , उन्हें शिव भगवान  कहते है 
  • जो निभाता वचन पिता का ,उन्हें श्री राम कहते है 
  • जो दिया उपदेश गीता में ,उन्हें कृष्ण भगवान कहते है 

Life is valuable

Understand it displine in life

Every body knows that any work done by "Discipline" gives success.

'Knows the power of  "DISCIPLINE"

There are 26 alphabets in English Language such as "D" ranks 4th "O" ranks 15th, similarly, if we calculate the sum  of the ranks of all the lrtters of word "DISCIPLINE" we will get 100, which means 100% success.
  • D  4
  • I   9
  • S  19
  • C  3
  • I    9
  • P   16
  • L   12
  • I     9
  • N   14
  • E     5
=100% 

"Nothing is impossible because "IMPOSSIBLE"word is made by " I am possible".

बुधवार, 22 अगस्त 2012

परम महिमामयी अंगारक चतुर्थी

'अंगारक चतुर्थी 'कि महात्म्य -कथा गणेशपुराण के उपासना खंड के ६०वे अध्याय में वर्णित है| वाह कथा संक्षेप में इस प्रकार है -"धरती माँ ने महामुनि भरद्वाज के जपा पुष्प -तुल्य अरुण पुत्र का पालन किया| सात वर्ष के बाद उन्होंने उसे महर्षि के पास पहुँचा दिया| महर्षि ने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने पुत्र का आलिगन किया और उसका सविधि उपनयन कराकर उसे वेद- शास्त्रादी का अध्ययन कराया| फिर उन्होंने अपने प्रिय पुत्र को गणपति मन्त्र दे कर उसे गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए आराधना करने कि आज्ञा दी|
मुनि पुत्र ने अपने पिता के चरणों में प्रणाम कर के गंगा तट पर जा कर वाह परम प्रभु गणेश जी ध्यान करते हुए भक्तिपूर्वक उनके मन्त्र का जप करने लगा| वह बालक निराहार रहकर एक सहस्त्र वर्ष तक गणेश जी के ध्यान के साथ उनका मन्त्र जपता रहा| माघ कृष्ण चतुर्थी को चन्द्रोदय होने पर दिव्य वस्त्रधारी अष्टभुज चन्द्रभाल प्रसन्न होकर प्रकट हुए|वे विविध अलंकारों से विभूषित अनेक सूर्यों से भी अधिक दीप्तिमान थे|
वरदप्रभु बोले- 'मुनि कुमार!मैं तुम्हारे ताप से बहुत प्रसन्न हूँ| तुम इच्क्षित  वर मांगो|प्रसन्न धरतीपुत्र ने निवेदन किया कि "प्रभु ! आपके दुर्लभ दर्शन से मैं कृतार्थ हुआ, मेरा जीवन सफल हुआ, आप दयामय है आप ऐसा करे कि मैं स्वर्ग मेंदेवतागनकेसाथसुधापान करूं  एवम    मेरा    नाम    मेंकल्याणकरने   वाला  मंगल हो|"हे करुनामुर्ती मुझे आपका दर्शन माघ कृष्ण पक्ष कि चतुर्थी को हुआ  अतएव यह पुण्य देने वाली संकट हरिणी हो |भगवान  ने एवमस्तु कहा और बोला कि मंगल नाम है तुम्हारा इसलिए इस दिन पड़ने वाली चतुर्थी अंगारक चतुर्थी के नाम से जानी जाएगी मंगल के दिन मेरी पूजा अर्चना का फल याचक को पुर्णतः प्राप्त होगा|उनके किसी भी कार्य में बाधा नहीं आएगी|
परम कारुणिक गणेश जी को विशुद्ध प्रीतिअभीष्ट है,श्रद्धा और भक्तिपूर्वक चढ़ाया हुआ मात्र दूर्वा से भी वो प्रसन्न हो जाते है| केवल श्रद्धा हृदय से होनी चाहिए| 

शनिवार, 18 अगस्त 2012

श्री शनिदेव का मंदिर,शनिश्चरा ,एती ,मुरैना


जिला मुरैना में शनिचरा पहाड़ी पर स्थित ,श्री शनिदेव मंदिर का देश में बहुत महत्व है /यह देश का सबसे प्राचीन  त्रेता युग का शनि  मंदिर है /यहाँ स्थापित  प्रतिमा भी विशेष  एव  अद्भुत है / ज्योतिषियों के अनुसार यह मूर्ति आसमान से टूट कर गिरे उल्का पिंड से निर्मित हुयी है /एक एनी कथा के अनुसार हनुमान जी ने अपनी बुद्धि चातुर्य से कम लेते हुए शनिदेव को लंकापति रावण के पैरों के नीचे से मुक्त कराया था  और कई वर्षों तक दबे रहने के कारण  शनिदेव दुर्बल हो चुके थे /लंका दहन के लिए शनिदेव ने बताया की जब तक वे वहन रहेगे लंका दहन नहीं हो सकता /तब हनुमानजी ने शनिदेव को मुरैना के इस पर्वत पर पहुंचाया ,जिसे अब शनि पर्वत कहा  जाता है /
शनिदेव  की मूर्ति स्थापना चक्रवर्ती रजा विक्रमादित्य ने की थी/  

श्री शनिदेव का परिचय 

 पिता ---सूर्यदेव 
माता --छाया (सुवर्ण)
भाई --यमराज 
बहन --यमुना 
गुरु --शिवजी 
गोत्र--कश्यप 
रूचि --अध्यात्म ,कानून ,कूटनीति ,राजनीती 
जन्मस्थल --सौराष्ट्र 
रंग --श्याम -कृष्ण 
स्वभाव --गंभीर ,त्यागी हठी ,क्रोधी ,न्यायप्रिय 
प्रिय  सखा --कालभैरव ,हनुमानजी ,बुध ,राहू 
राशि --मकर ,कुम्भ 
अधिपति --रात 
कार्यक्षेत्र --न्यायदाता 
दिन शनिवार, तिथि - अमावस्या 
नक्षत्र --अनुराधा ,पुष्य ,उत्तरभाद्र पक्ष 
रत्न --नीलम 
वस्तुए -कलि वस्तुए ,तेल ,काली उड़द ,चना ,
धातु ---लोहा इस्पात 
रोग ---वातरोग ,कैंसर ,कुष्ठ ,
प्रभाव --साढ़े सात  वर्ष 
महादशा --19 वर्ष 

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

दैनिक जीवन में गणेश जी का स्थान


भारतीय  परम्परा  में  गणेश  पूजन का    बहुत  महत्तव है /गणेश शब्द का विग्रह  है --गण +ईश / गण का अर्थ देवताओं  का समूह और  ईश का अर्थ  उसका स्वामी / अतः  गणेश का अर्थ हुआ  " देवताओं  के समूह का स्वामी "/जो परम पिता परमेश्वर  के अतिरिक्त अन्य  कोई  हो ही नहीं सकता/ अतः  गणेश की पूजा से हम प्रभु  की ही पूजा करते हैं /

श्री  गणेश जी के पिता जगद विख्यात  प्रभु भोले  नाथ श्री शिवजी हैं  /सभी परिवारों में बच्चों  के विद्या आरम्भ  गणपति पूजन से ही करायी जाती है /जिससे  बच्चा श्री गणपति जी के समान विद्वान बने   एवं श्रेष्ठता  में सर्वोपरि हो /विवाह  के समय भी सबसे पहले गणेश पूजन होती है जिससे  सारे  कार्य  बिना किसी विघ्न  के पूर्ण  हों और उनका जीवन मगंलमय  हो/

रविवार, 14 अगस्त 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जंग

 आज टी.वी मिडिया सब जगह अन्ना हजारे के मुहीम को दिखाया जा रहा है|देख कर आत्म विश्वास जागृत होता है कि अभी देश कि रक्षा के लिए लोग है, किन्तु ये सोच कर कष्ट होता है कि अपने ही आज़ाद देश में आन्दोलन कि ज़रूरत आ पड़ी है,क्या देश आज़ाद है केवल झंडा फहरा कर लड्डू बाँटने के लिए?अगर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठता है तो सरकार हमारा धन लूट कर इतनी मजबूत हो गयी है कि वो हमें दबा कर गलत आरोप लगा कर चुप होने पर मजबूर करती है क्योकि हम उन्हें अपना प्रतिनिधित्व चुन कर एक ऐसी ताकत दे चुके है जिसका सरकार पूरा फायदा उठती है.........
 आज़ाद देश में रह कर भी आज आम इन्सान डर कर जी रहा है| किस बात पर कहाँ उसे दबा दिया जायेगा शायद किसी को पता नहीं होता....आज यही कारण है कि हमारी नयी पीढ़ी विदेशों में जा  कर बसने लगी है.....आज अच्छे Doctor, Scientist,Engineer etc.सभी U.S.A., U.K.जैसी जगहों पर जा कर रहना चाहते है|आखिर क्यों?क्योकि हमारे देश में केवल राजनीती रह गयी इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं....अब देखने कि बात ये है कि हजारे जी का ये अनशन क्या रंग लाता है......क्योकि सत्ता के अधिकारीयों के पास दिल नहीं है...न ही आत्मसम्मान.....नेता पूरी तरह से गिरे हुए है इसी कारण सबके ऊपर ऐसा आरोप लगाते है....क्योकि पुरानी कहावत है कि जो जैसा होता है दुसरे को भी वैसा ही समझता है......
किन्तु अब समय आ गया है जब देश कि जनता जागेगी और भ्रष्टाचार ख़त्म होगा क्योकि पाप का घड़ा भर चुका है.......

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

जीवन चक्र

आज मैं  बाबा की महासमाधि को टीवी पर देख रही थी और ये सोचने को मजबूर थी की ये जीवन क्या है?बाबा का जीवन मानवता के लिए समर्पित था,एवम मानव उनकेभक्त  रूप  मेंथे|करोड़ों जनता की भक्ति, राजकीय सम्मान ,क्या मंत्री क्या संत्री सब एक समान बाबा के दरबार में थे|बाबा ने करोड़ों लोगों का उद्धार  किया,जो की एक साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता क्योकि मनुष्य स्वार्थी होता है|लेकिन एक ही चीज़ मन में खटकती है की हम मुट्ठी बांध अपनी किस्मत साथ लेकर आते हैं जाते समय हाथ खुला होता है की हम कुछ साथ लेकर नहीं जा रहें हैं |तो हम इस जीवन में हाय हत्या क्यों करते हैं?
अभी बाबा की सम्पति को लेकर वादविवाद क्यों हो रहा है......उसे जैसा चल रहा था वैसा क्यों नहीं चलने देते?अंत के बाद नाम, धन दौलत .प्रसिद्धि सब इसी धरती पर ही रह जाती है|अच्छे कर्म करने से लोग जन्मजन्म  तक याद रखते हैं पूजते है,नेताओं की तरह कर्म करने पर कहीं चौराहे पर मूर्ति बना कर खड़ा कर दिया जाता है की मूर्ति बनने के बाद भी धुप गर्मी सहते रहो......  सत साई बाबा,शिर्डी साई बाबा,मदर टेरेसा जैसे कर्म करने पर ही इश्वर की उपाधि मिलती है और सही मायने में ये ही ईश्वर और इनका हाथ हमारे सर पर हमेशा होना चाहिए......ॐ साई राम.........

रविवार, 24 अप्रैल 2011

सत साई बाबा

सत साई बाबा के चरणों को ध्यान करते हुए ये लिखने की कोशिश कर रहीं हूँ की उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्यागा है न की हमारा साथ......वो हमारे बीच हमेशा थे ,हमेशा हैं, एवम हमेशा रहेगे |मुझे हमेशा White field bangluru और पुतापरती याद रहेगा जहाँ मैने दर्शन पाया था.....
एक दिव्य शक्ति थी मुख पर एक तेज था.....अभी लोगों को जरूरत थी उनकी ........लगता है की बाबा तुम क्यों छोड़ गए लकिन आत्मा यही कहती है की बाबा कहीं नहीं छोड़े हैं बाबा हमारे आत्मा में हैं हमारे साथ हैं ......हमें मन की आखोँसे देखना है .....बाबा कहते हैं की गरीबो की सेवा करो हम ये कोशिश करेगे की मुझसे जितना बन पड़े मैं उतना कर सकूँ मैं बाबा का यही ध्यान करुगी की बाबा मुझे इतनी शक्ति दो की मै आपके बताये मार्ग पर चल सकूँ ..............
आज आत्मा दुखी है किन्तु यही समझाने की कोशिश में हूँ की बाबा क़दमों में ही हमारी भलाई है .....बाबा की कही हर  बातो  का अनुसरण करना ही सच्ची याद  है..................

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

पापाजी के जन्म दिवस के पावन अवसर पर

आज पापजी का  जन्मदिवस है|इस पावन अवसर पर हम सब हार्दिक शुभ कामनाए देते है...

प्रथम दिवस नववर्ष का  
आपके अवतरित होने से,
आगमन हुआ हर्ष का,
चंद्रमा की कलाओं से युक्त,
चांदनी की शीतलता से प्रयुक्त,
आपका स्वभाव,
 इसीलिए,
लेखनी हमें लिखने को उद्यत करती  है,
जब हृदय में ये झंकार होती है,
नव वर्ष भी प्रकाशमान होता है,
आपके पावन जन्मदिवस पर|
हम सब गौरवान्वित है,
आप जैसे मार्गदर्शक पिता मिलने से,
अभिनंदन करते हैं हम सब मिल कर ,
सुमन वर्षा करते हैं आपके चरण कमलों पर,
आपके वरदहस्त सदैव रहें हम सबके शीश पर,
क्योकि हम सब जीते हैं आपके आशीष पर,
आज हम सब हार्दिक अभिनन्दन करते हैं
आपके पावन जन्मदिवस पर............
आपके जन्म दिवस पर कोटि कोटि अभिनंदन|इस दिन का आगमन हो वर्ष वर्षांतर यही हम सब की अभिलाषा है|

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

सही पहचान

मैं अक्सर गौरव जी महाराज का भागवत सुनती हूँ और उनके द्वारा बताये गए प्रसंग को अपनाना चाहती हूँ ऐसा ही एक प्रसंग कल भी मैने  सुना कि मनुष्य के अंदर सब कुछ है आग हवा पानी मिट्टी, यहाँ तक कि इसको बनाने वाला इश्वर भी|किन्तु हमें आयने के सामने हमारा बाहरी  आवरण दिखाई देता है |हम स्वयं को कभी समझ नहीं पाते कि असल में हम क्या हैं ?हमारी खूबी  बाहरी चमक धमक में छुप जाती है,हम दूसरे को देख कर कदम बढ़ाते हैं हम स्वयं को नहीं समझ  पाते|इश्वर तो सब में है किन्तु हम उसका अपमान करते हैं|दूसरे को नीचा दिखाने कि कोशिश करते हैं|
आयना तो ऊपर का ही आवरण दिखाता हे यदि खुद को देखना है तो हमें अंतरात्मा कि आखें खोलनी होगी स्वयं को पहचानना होगा कि मैं कौन हूँ?सब कुछ तो हमारे अंदर है तो फिर क्या तलाश है?तलाश है तो सही संगत  का जिससे हमें सही ज्ञान हो|हमें बाहरी आवरण उतारना होगा तभी सही दिशा मिलेगी|अन्यथा हमें दवा खा कर ही जीवन चलाना होगा|  
  

दान पुण्य

दान देना एक पुण्य का कार्य है किन्तु लोगों में असमंजसता रहती है  कि दान हमें कब क्यों एवम कैसे देना चाहिए?दूसरा लोगों में ये भी भावना रहती है कि हम परिश्रम से अपने लिए कमा रहें तो हम क्यों दें?
दान एक ऐसा विषय है इस  पर जितना लिखो उतना कम है|दान हमें क्यों करना चाहिए?पहला प्रश्न ये उठता है?दान हमें इसलिए करना चाहिए क्योकि दान करने से मिला हुआ गुप्त आशीर्वाद हमारी धरोहर होती है जो कि हमें और हमारे बच्चों के काम आती है ये एक ऐसी धरोहर है जिसे कोई ना तो चुरा सकता है ना ही बाँट सकता है|
अब प्रश्न उठता है कि दान कब करना चाहिए दान करने का कोई ना तो वक्त होता है और ना ही उम्र होती है जब भी जरूरत हो तो पीछे नहीं हटना चाहिए |
तीसरा प्रश्न होता है कि दान किसे करना चाहिए? दान उसे ही करना चाहिए जो असमर्थ हो, जिसे सच में ज़रूरत हो|जो परिश्रम करने में जी ना चुराता हो|उसे आपकी दी हुयी  चीज़ों की आवश्यकता हो|
दान क्या करना चाहिए?दान कोई ज़रूरी नहीं है कि सोना चाँदी,धन दौलत इत्यादि हो|दान कुछ भी हो सकता है,आपकी सेवा भाव, आपकी मुस्कुराहट,आपका वक्त|यदि सामर्थ्य है तो किसी का जीवन बना कर|दान कभी भी दिखावा में नहीं करना चाहिए क्योंकि वो कभी फलता नहीं|गुप्त दान हमेशा ही अच होता है|

दान कितना करना चाहिए, क्या सब दान करना चाहिए,अपने बच्चों  के लिए कितना  छोड़ना चाहिए? अपने बच्चों के लिए केवल उतना ही छोड़ना चाहिए जितने में उनका भविष्य बन सके इतना नहीं छोड़ना चाहिए कि वो अपने जीवन में कुछ ना कर सकें|
हम राजा हरिश्चंद्र  या कर्ण तो नहीं बन सकते किन्तु शायद इतना तो कर सकते हैं कि किसी का दिल ना दुखाएं यदि हो सके तो मुस्कुराहट एवम वक्त तो थोडा दान कर ही सकते है वो भी निश्छल भाव से|

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर

दिल्ली का  अक्षरधाम मंदिर अनेक शिल्पकारों को लेकर बहुत ही कलात्मक रूप से  बनाया गया है, मंदिर बहुत ही भव्य है|इस भव्यता को चार चाँद लगता है वहाँ की  प्रदर्शनी जो की जीवंत लगती है|इस की शुरूआत प्रदर्शनी के पहले भाग से होता है, जहाँ ये समझाने की कोशिश की गयी है कि इमारत को बनाने में तो अनेकों शिल्पकारों कि जरूरत होती है किन्तु स्वयं को बनाने के लिए मात्र आत्मविश्वास कि जरूरत होती है हमें स्वयं  को बनाना है स्वयं को ही समझाना होगा कि क्या गलत है और  क्या सही?स्वामी नारायण ,नीलकंठ महराज जी के व्यक्तित्व के जरिये ये समझाने कि कोशिश कि गयी है कि दूसरों का बुरा मत सोचो ,हो सके तो सहायता करो....इसी में नौका यात्रा के द्वारा ये बताया जाता है कि भारत एक ऐसा देश है जहाँ पुरातन से कोई ना कोई खोज हुआ है|इस अक्षधाम का आखिरी मुकाम नीलकंठ महाराज जी का जीवन यात्रा है जो एक सिनेमा के द्वारा दिखाया गया है |
इसमें सीखने के लिए बहुत कुछ है यदि मनुष्य सीखना चाहे लेकिन दर्द इसी बात का है कि हम इस खुबसूरत जगह को भी बुराई में बदलना चाहते है उसे पिकनिक का स्थान बना लिया है |ख़ैर.... अक्षरधाम मंदिर बहुत ही सुंदर है अंत में यही कहना चाहूंगी कि प्रत्येक मंदिर कुछ कुछ ना कहता है हमें समझना है सीखना है एवम अपने जीवन को सवारना होगा.... 

शनिवार, 6 नवंबर 2010

आखिर खुशियाँ कहाँ है??

हम सभी खुशियों के तलाश में रहते हैं लेकिन किसी से यदि ये पूछो कि आप तो आनन्द से हो .तो उसका यही जवाब होता है कि नहीं मैं तो जीवन से बहुत परेशान हूँ............अब प्रश्न ये उठता है कि आखिर खुशियाँ कहाँ है??हम आनन्द को कहाँ ढूढें?आनंद कि तलाश में सभी रहतें हैं किन्तु ख़ुशी बहुत कम लोगों को मिलती है ऐसा क्यों होता है? इसका मुश्किल है किन्तु नामुमुकिन नहीं ...............मै किसी पत्रिका में पढ़ रही थी कि एक बार नेहरूजी से किसी ने पूछा कि आप हमेशा खुश रहते हैं आपको कभी भी तनाव नहीं होता इसका राज़ क्या है? नेहरु जी ने कहा कि मैं  बच्चों  से स्नेह करता हूँ प्रकृति से प्यार करता हूँ दूसरे कि कही बातों पर ध्यान नहीं देता  अपना काम  स्वयं करता हूँ यही हमारे प्रसन्न रहने का राज़ है|
  ये सत्य है कि हमें खुशियाँ छोटी छोटी चीज़ों में मिलती है,कीमती वस्तु में या बहुत धनि होने में ये ख़ुशी का दायरा सिमट जाता है |प्रकृति से लगाव, दूसरों में खुशिया बाटने का चाव ही हमें खुशियाँ देता है|त्यौहार पर यदि हम किसी गरीब का चूल्हा जलवा देते है तो उसकी ख़ुशी में ही हमारी खुशियाँ है|हम जब किसी के परेशानी  में उसका सहारा बनते हैं उसकी अचानक आई परेशानी जब दूर होती तो उसकी उस जीत में ही हमारी ख़ुशी है|
आनन्द तो हमारे द्वार पर रहता है किन्तु हम उसकी तलाश में पूरा जीवन व्यर्थ में गवां देते हैं हम भी कस्तूरी मृग के समान हैं जो कि कस्तूरी अपने नाभि में रख कर पुरे वन में उस सुगंध को तलाशता है|हम मानव जीवन में है जिसे ज्ञान है तो हम क्यों पशु कि तरह अपना ही बारे में क्यों सोचे |दूसरों  कि ख़ुशी में जल कर राख ना हों शायद हम यहीं से खुशियाँ जोड़ सकते हैं |
दीपावली कि शुभकामना  के साथ यही आशा है कि सब के घर माँ लक्ष्मी ढेरों खुशियाँ के साथ आएगी.............................  

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

राहुल दुलहनिया तो ले गया लेकिन अब???????

सुबह कि गरमा गरम खबर डिम्पी महाजन ने घर छोड़ा .............मार पिटाई का किस्सा .........क्या शादी जैसा पवित्र बंधन राहुल महाजन के लिए मजाक के सिवा कुछ भी नहीं ??पहले लड़कियों को बुला कर एक एक के साथ समय बिताना फिर सबको हटाते हुए एक को चुन कर शादी करना ????ये लड़कियां भी क्यों नहीं समझी कि जब श्वेता जैसी सुघड़ लड़की के साथ राहुल ने ऐसा बर्ताव किया तो उनके साथ भी वही होना है क्या श्वेता में कोई कमी थी नहीं राहुल कि नजरों में लडकी सिर्फ लड़की है महिला कि कोई प्रतिष्ठा नहीं है| हो सकता है कि पत्नी डिम्पी भी गलत हो किन्तु एक महिला होने के नाते मैं ये कहूँगी  कि प्रताड़ित करना समस्या का समाधान नहीं है....घर के अंदर किसी भी समस्या का हल निकाला जा सकता है.....हम भारतीय संस्कृति कि बड़ी बड़ी बातें करतें हैं क्या यही भारतीय संस्कृति है???
यदि पति पत्नी का विश्वास कायम नहीं कर सकते एक दूसरे को समझ नहीं सकते तो शायद ऐसे लोगों को विवाह नहीं करना चाहिए...क्योकि यदि ऐसी भद्दी तस्वीर बार बार सामने आएगी तो लोगों का विवाह जैसे पवित्र एवम प्यारे बंधन पर से विश्वास हट जायेगा .......आखिर ये सब कब बंद होगा माना कि ये बड़े लोगों कि बाते हैं तो सामने आ गयी अन्यथा कितने लोग इसी गुनाहों को सहते हुए सारी जिंदगी बीता देते है.....
आज के समय में हम लड़के लड़कियों को एक बराबर मानते है लेकिन क्या यही बराबरी है??जहाँ पहली पत्नी ने बर्दाश्त किया और वही हाल दुसरी पत्नी का भी हुआ क्या अब कोई दूसरी लड़की शादी करना चाहेगी???मेरी तो यही सोच है कि एक बार सेर को सवा सेर तो मिलना ही चाहिए......जिससे लोगों को महिला का इज्ज़त करना आजाये......