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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

भार्तिहारी शतक

                                          नीति शतक

1. बुद्धिमान जन ईर्ष्या से ग्रस्त हैं, अधिकारी जन घमंड में चूर हैं, अन्य लोग अज्ञान से पीड़ित हैं,ऐसी दशा में समझदारी की बातें और ज्ञान सूक्तियाँ किनसे कहें?तभी तो उत्तम विचार  मन में ही गल सड़ जाते हैं।

2. अबोध को आसानी से समझाया जा सकता है,ज्ञानी को इशारा ही काफी है।अंशमात्र ज्ञान से ही जो स्वयम को परम ज्ञानी मान  बैठा है उस मनुष्य  को ब्रह्मा भी संतुष्ट नहीं कर सकता।

3. जब में थोडा समझदार हुआ तो हाथी की तरह घमंड में चूर रहने लगा।तब मेरा मन भ्रम से लिप्त हो गया की में तो सर्वज्ञ हूँ।जब बुद्धिमानों की संगती से थोड़ा -थोड़ा जानने के योग्य हुआ तब समझ आया की में निपट मूर्ख हूँ,और मेरा दर्प ज्वर के समान उतर गया।

4.आग को पानी से रोक जा सकता है,सूर्य की धूप  को छाते से ,मदमस्त हाथी को तीखे अंकुश से, रोग को औषधालय या औषध-संग्रह से और विष को भांति भांति के उपायों से रोका जा सकता है,शास्त्रों में वर्णित सभी रोगों का इलाज है परन्तु मूर्खों की कोई दावा नहीं है।

                             

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