Hmarivani

www.hamarivani.com

Hmarivani

www.hamarivani.com

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

माघ मास



हिन्दू पंचांग में माघ मास का बहुत महत्त्व है|यह मास मोक्षदाई  माना जाता है| इस मास में लोग प्रतिदिन नदी में स्नान करतें हैं| कशी, प्रयाग, हरिद्वार, नासिक इत्यादि स्थान इसके लिए बहुत प्रसिद्ध हैं|किन्तु सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है प्रयाग में जहाँ एक महीने का कल्पवास होता हैं|पौष पूर्णिमा से माघ की पूर्णिमा तक का यह अल्पवास एक मास का होता है| इस समय फूस की कुटिया बना कर संगम के तट पर रहते हैं,एक वक्त सात्त्विक भोजन, एक वक्त फलाहार कर के रहते है|प्रातः काल जल्दी उठाना, संगम में स्नान करना, पूजा करना, फिर भोजन करके महात्माओं के प्रवचन सुनना,सायंकाल गंगाजी की आरती करना,ये इनकी दिनचर्या होती है|सायकल के दीप जलाने में नित्य एक दीपक बढ़ता है, जो की आखिरी दिन तीस दीपक एक साथ प्रति व्यक्ति जलाता है,जोकि सायंकाल बहुत ही सुंदर प्रतीत होता है|
 माघ मास में गणेश चतुर्थी,सक्रांति मौनी अमावस्या, गुप्त नवरात्री,  बसंत पंचमी,एवम माघी पूर्णिमा जैसे पावन पर्व आते हैं|  सन २०१० में माघमास १ जनवरी २०१० से ३० जनवरी २०१० तक है|

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

HAPPY NEW YEAR 2010



New Year



New Year has become a national festival in India. The excitement to celebrate the event is present everywhere. The day is celebrated with a lot of fervor and enthusiasm and is marked by prayers', parties, New Year fetes and social feasts.




New Year's Eve in India


New Year's Eve in India is the time to party and dig into the last minute fun. People enjoy partying with friends and family members. All the night clubs, discotheques, amusement parks and even the cinema halls are thronged by people of all ages. The idea behind these get-togethers is to give farewell to the by-gone year and welcome the New Year bountifully.

People in New Year Eve's Parties are seen in colorful new dresses especially selected for the occasion. New Year Eve's party in India usually hold a festive theme. Be it a color code or a unique dress code - theme dressing heightens the spirit of the New Year Eve's mood.


People escalate these celebrations with good music, dance, sumptuous dinner and of course by lighting bonfires and burning crackers.


New Year Celebrations in India


Different cities in India have different ideas of celebrating New Year. In metropolitan and big cities New Year celebrations are lavish and grand while in smaller cities and towns these celebrations tend to be comparatively low-key. Although, in present times one can see smaller cities are trying to catch up with the euphoria and the extravaganza of the big town New Year bashes.


People also exchange New Year gifts, flowers and greeting cards with their dear ones. This helps to create a feeling of togetherness and care. People also make New Year resolutions on the day and promise to follow it up.



New Year Eve in Goa


Rave parties are life of Goa- full of dance, music and jest. These parties are organized every night around the time of New Year. It attracts a large number of tourists from India and around the world. New Year celebrations. New year balls are organised in almost every town and village of Goa. People are often seen relishing the gala dinner on the beach restaurants and hotels. Apart from it, live orchestra parties form an integral part of New Year celebrations. An air of festive mood pervade everywhere and become go maniac about the last minute celebrations.





सोमवार, 28 दिसंबर 2009

जीवन के मूल्य - VALUES OF LIFE


जीवन के कुछ उपयोगी तथ्य ऐसे हैं जिनसे जीवन जीना यथार्थ होता है और उन्ही में  से चंद महत्त्वपूर्ण मूल्य कुछ इस प्रकार हैं ( Some of the important vlaues of life to be followed are listed below , even if one can follow half of them , one would lead a highly content , meaningful and satisfied life ):-
  • सत्य - Truthfulness
  • अहिंसा - Non-Violence
  • अस्तेय - Not Stealing property of others
  • ब्रह्मचर्य - Bachelorhood / Chastity
  • अपरिग्रह - Non acceptance of charity
  • शुद्धता - Purity
  • संतोष - Satisfaction
  • आत्मसंयम - Self Restraint
  • शास्त्राभ्यास - Reading religious books and practicing them
  • भगवदभक्ति - Belief in God
  • आध्यात्मिक विवेक - Spiritual Knowledge , direction
  • आत्मानुशासन - Self Discipline
  • इन्द्रिय निग्रह - Control over sensual appetites
  • सहिष्णुता - Tolerence
  • पवित्रता - Pure , Holy, Divine
  • क्षमा - Forgiveness
  • साहस - Bravery
  • करुणा - Kindness
  • परमार्थ - Salvation
  • पाखंड से मुक्ति - No Hypocrisy
  • परोक्ष निंदा का आभाव - No blame game
  • सीधापन - Simplicity
  • विनय भाव - Decent , courteous behaviour
  • सहनशीलता - Forbearance
  • सेवाभाव - Feeling of Service to others 
  • सत्संगति - Good , pious company
  • जप - Adoration
  • ध्यान - Concentration
  • अद्वेष - Without Jealousy
  • निर्भयता - Fearless
  • स्थिर चित्तता - Determination
  • निरहंकार - Without Ego
  • मैत्रीभाव - Friendly
  • उदारता - Generous , Open Heartedness
  • कर्त्तव्यनिष्ठा - Duty Bound
  • धीरज  - Patience

कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी




१) घर में नौ  इंच से छोटी देव प्रतिमा होनी चाहिए| इससे बड़ी प्रतिमा घर से बाहर मंदिर में रखना चाहिए|
२) आरती के समय भगवन विष्णु के समक्ष बारह बार, सूर्य के समक्ष सात बार, दुर्गा जी के समक्ष नौ बार, शंकर भगवन के समक्ष ग्यारह बार, और गणेश जी के समक्ष चार बार,आरती घुमानी चाहिए|
३) पूजा करते समय केवल भूमि पर न बैठें| आसन जरुर बिछाएं|
)रुद्राक्ष की माला से श्री गायत्री, श्री दुर्गा जी, श्री गणेशजी, श्री कार्तिकेय जी, एवम पार्वती जी की मन्त्रों का जप करना चाहिए|
५)तुलसी की माला से श्री राम, श्री कृष्ण, सूर्य नारायण, वामन ,एवम विष्णु अवतार के सभी देवों के मन्त्रों का जप करना चाहिए|
६)सफ़ेद चंदन की माला से सभी देवी देवताओं का जप कर सकते हैं|
७)लाल चंदन से श्री दुर्गा जी, हनुमान जी का जप कर सकते हैं|
८)स्फटिक माला से सरस्वती जी, गणपति जी का जप कर सकते हैं|
९) कमलगट्टे की माला से श्री कक्ष्मी जी का जप कर सकते हैं|
१०)जिस पर जप करे, उस स्थान की मृत्तिका (मिटटी ) जप के पश्चात मस्तक पर लगायें अन्यथा उस जप के फल को इन्द्र ले लेते हैं|
११)जप से उठने के तुरंत बाद आसन को लपेट कर रख दें अन्यथा आपके पुण्य को देवता ले जाते हैं|

रविवार, 27 दिसंबर 2009

ज्ञानयोग



१) जिन व्यक्तियों का ह्रदय पवित्र है , वो धन्य हैं , क्योंकि उन्हें ईश्वर के द्वारा ज्ञान प्राप्त हुआ  है |
२) जिस प्रकार उगता हुआ सूर्य रात्रि के अंधकार का विनाश कर देता है , वैसे ही आत्मा का ज्ञान समस्त भ्रमों को दूर हटा देता है |
३) मानव जन्म धन्य है ; स्वर्ग के निवासी भी इस जन्म की कामना करते हैं ; क्योंकि मनुष्य के द्वारा ही वास्तविक ज्ञान और विशुद्ध प्रेम की प्राप्ति के जा सकती है |
४) पृथ्वी या स्वर्ग में जीवन लाभ की कोशिश न करें | जीवन के प्रति तृष्णा माया है | जीवन को  क्षणस्थायी जानते हुए अज्ञान के इस स्वप्न से जाग उठो , मृत्यु का ग्रास बनने से पूर्व ज्ञान और मुक्ति पाने का प्रयास करो | 
५) मान रहितता,दंभ हीनता, अहिंसा, क्षमाभाव, मन-वाणी की सरलता, सरधा-भक्ति पूर्वक गुरु की सेवा, शुद्धता, और मन एवम इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह -इन सब को ज्ञान कहा जाता है |

चाणक्य नीति


चाणक्य  नीति में लिखा है कि ''सोने की पहचान घिसकर, काटकर, पीटकर, तथा तपाकर की जाती है| इसी प्रकार से मनुष्य की परीक्षा, त्याग, गुण, आचार से की जाती हैं| "

ये बात  एकदम सत्य है कि मनुष्य योनी में जन्म लेने का तात्पर्य यही,है कि हमारे गुण,आचार,व्यवहार,भावना  अच्छे  होने चाहिये| तभी समाज में सम्मान  प्राप्त होता है | रही बात परीक्षा एवम त्याग की तो यह बात भी एकदम सत्य है कि मानव जीवन में परीक्षा का अहम स्थन है, क्योकि यदि हम पीछे देखते हैं त्रेता युग में और द्वापर युग में जहाँ श्री राम एवम श्रीकृष्ण का मनुष्य योनी में जन्म हुआ, उन्हें कठीन  परीक्षाओं से गुजरना पड़ा| उनके लिए भी पग पग पर तनाव था किन्तु वो उसे हंस कर झेलते  थे,यहाँ तक कि सीता जी को भी कितने कष्ट का सामना करना पड़ा |
 कहने का तात्पर्य यह है कि मानव जीवन ही परीक्षा है जिसे हमें हंस कर   झेलना चाहिए,उसे और रो कर कष्टकारी नहीं बनाना चाहिए|  मानव जीवन में जब स्वयं  प्रभु ने भी जन्म लिया तो उन्हें भी अनेकों कष्ट का सामना करना पड़ा, अर्थात हमें अपने आचरण, अपने व्यवहार, को बहुत अच्छे रखने चाहिए, त्याग की भावना जीवन को सवांरने  के लिए रखना चाहिए| तभी हम स्वर्ण की भांती निखर सकते हैं|

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

Christmas Eve Celebrations



Christmas Eve is the day before Christmas. The celebration of Christmas begins on the evening of December 24. The importance of Christmas Eve in terms of popular customs is greater than that of the Day itself. On this day, the Christmas-tree is manifested in its glory; then, the Yule log is solemnly lighted in many lands; then often the most distinctive Christmas meal takes place.


Midnight Mass

The Midnight masses was originally celebrated by the Pope towards midnight in the chapel of the Santa Maria Maggiore Basilica in Rome, before a small congregation. The celebration of mass at midnight is based on the ancient belief that Jesus was born precisely on the stroke of twelve. Solemn and impressive with the happy sound of pealing bells, with light sparkling everywhere and with hymns of joy are some of the inevitable aspect of Midnight Mass.Celebrations


Celebrations
Christmas Eve is the day for family reunions. Many Christians traditionally celebrate a Midnight mass at midnight on Christmas Eve, marking the beginning of Christmas Day. Other churches hold Candlelight service which is typically held earlier in the evening. It is also seen as the night when Santa Claus or his international variants, make their rounds giving gifts to good children.

 




गुरुवार, 24 दिसंबर 2009


SANTA CLAUS

According to the Christian mythology, Santa Claus is a merry old man who visits the home of good children on Christmas eve and delights them by giving them gifts. The mythical history of Snata Claus is recreated even in present times and even today Santa Claus , the legendary bringer of gifts is a well-loved figure of all. Most importantly, he is the patron saint if children.Santa Claus has created an unforgettable picture in the minds and hearts of young kids.

ORIGIN OF SANTA CLAUS :-

Mythical Santa Claus originated from the Turkish Bishop name St. Nicholas who lived in the 4th century AD. It is said that St. Nicholas was born in a very wealthy family living in south Turkey.He was always very kind to people and was famous for his benovelence for those in trouble. When his parents died he gave all his wealth in charity. He supposed to have died on Dec. 6 and that is why in some places St. Nicholas feast is celebrated on this day.

His kindheartedness and helping nature earned him the title of the MAGICAL WORKER as well as SANTA CLAUS.

History of Christmas Tree




 



MERRY  CHRISTMAS


Some people trace the origin of the Christmas tree to an earlier period. Even before the Christian era, trees and boughs were used for ceremonials. Egyptians, in celebrating the winter solstice -- the shortest day of the year -- brought green date palms into their homes as a symbol of "life triumphant over death". When the Romans observed the feast of saturn, part of the ceremony was the raising of an evergreen bough. The early Scandinavians were said to have paid homage to the fir tree.
This use does not mean that our Christmas tree custom evolved solely from paganism, any more than did some of the present-day use of sighed in various religious rituals.This use does not mean that our Christmas tree custom evolved solely from paganism, any more than did some of the present-day use of sighed in various religious rituals.Some historians trace the lighted Christmas tree to Martin Luther. He attached lighted candles to a small evergreen tree, trying to simulate the reflections of the starlit heaven -- the heaven that looked down over Bethlehem on the first Christmas Eve.



To the Druids, sprigs of evergreen holly in the house meant eternal life; while to the Norsemen, they symbolized the revival of the sun god Balder. To those inclined toward superstition, branches of evergreens placed over the door kept out witches, ghosts, evil spirits and the like.
Trees and branches can be made purposeful as well as symbolic.


Christmas



Christmas is for joy, for giving and sharing, for laughter, for coming together with family and friends, for tinsel and brightly decorated packages... But mostly, Christmas is for love. It was this love for which Jesus came to this world and sacrificed his life.

 Christmas is a celebration of love and mirth symbolized by the Nativity, the Santa, the caribou, the poinsettia and the evergreens.Jesus was born to Mary. This was not an ordinary birth.Mary learned from lord's angle.that she is caused to be with a child. Mary and her husband Joseph also marks an end to the present year and feast for the coming year.

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

मानव जीवन की सार्थकता



मानव जीवन में जन्म लेने की सार्थकता क्या है? क्या केवल स्वयं के बारे में, अपने परिवार के बारे में  ही सोचना चाहिए?ये तो निराधार है|यूँ तो जानवर भी जन्म लेकर बच्चों को जन्म देता है, और केवल अपना एवम उनका पेट पालता है|किन्तु जब हमें मानव जीवन मिला है, हमें सोचने समझने की शक्ति प्राप्त हुई है तो हम क्यों जानवर की तरह व्यवहार करें|
हमें एक हमेशा एक शिकायत रहती है कि हमें घर से फुर्सत नहीं मिलती हमें कार्य से समय नहीं मिलता,किन्तु यदि हम चाहें तो दैनिक जीवन से भी समय निकाल सकते हैं, जरूरतमंद कि सेवा के लिए,थोडा  ईश्वर के ध्यान के लिए|मानव जीवन की यही सार्थकता है कि हम अपने आस पास ऐसा व्यवहार बनाएं कि आप वहां  रहें या न रहें किन्तु लोग आपको आपके अच्छे व्यवहार के कारण याद करें|
मनुष्य योनी में जन्म लेने का दूसरा अहं हिस्सा है कि हमें अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए |ये शुरुआत माता पिता की सेवा से शुरू होता है, जो की आज के युग में लुप्त हो रहा है |माता पिता जब बच्चों का जन्म देते हैं तो पूरी जिम्मेदारी के साथ उनका पालन करतें हैं किन्तु जब बच्चों की बारी आती हैतो वो अपनी जिम्मेदारी से मुकरते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए, दूसरों की सेवा से पहले घर की सेवा जरूरी है|
मानव जीवन का तीसरा अहम हिस्सा है जरुरतमंद की सहायता करना| निर्धन की मदद करना|किसी को संकट से निकालना |ये सब कार्य निःस्वार्थ भाव से किये जाते हैं तो फलदाई होते हैं|

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

बिल्वपत्र



शिव पूजा में बिल्व पत्र अर्थात बेलपत्र की महिमा अत्यधिक है, इसके बारे में शिवपुराण जैसे ग्रन्थ व्याख्या भरपूर करते हैं| जो व्यक्ति दो अथवा  तीन बेलपत्र भी शुध्द्तापूर्वक भगवन शिवजी पर चढ़ाता है,तो उसे निःसंदेह भवसागर से मुक्ति प्राप्ति होती है| जो व्यक्ति अखंडित (बिना कटा हुआ ) बेलपत्र भगवान शिव पर चढ़ाता है, वह निर्विवाद रूप से अंत में शिव लोक को प्राप्त होता है| बिल्व वृक्ष के दर्शन, स्पर्शन व प्रणाम करने से ही रात- दिन के सम्पूर्ण पाप दूर हो जाया  करते हैं| चौथ, अमावस्या, अष्टमी, नवमी, चौदस, संक्रांति, और सोमवार के दिन बिल्वपत्र तोडना मना है|
 बिल्वपत्र सदैव  उल्टा अर्पित करें,अर्थात पत्ते का चिकना भाग शिवलिंग के ऊपर रहें| बिल्वपत्र में चक्र एवम वज्र नहीं होना चाहिये |कीड़ों द्वारा बनाये हुए सफ़ेद चिन्ह को चक्र कहते हैं|एवम बिल्वपत्र के डंठल के मोटे भाग को वज्र कहते हैं|बिल्वपत्र चढाते समय बिल्वपत्र में तीन से ग्यारह दलों तक के बिल्वपत्र प्राप्त होतें हैं, ये जितने अधिक पत्रों के  हों, उतना ही उत्तम होता है| बिल्वपत्र कटे   फटे एवम कीड़े के खाए नहीं होने चाहिए|
महादेव को बिल्वपत्र  अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं ---
त्रीद्लं त्रिगुनाकारम त्रिनेत्रम च त्रिधायुतम|
त्रीजन्म पापसंहारम एक बिल्व शिव अर्पिन||"                             
बिल्वपत्र मिलने की मुश्किल हो तो उसके स्थान पर चांदी का बिल्वपत्र चढ़ाया जा सकता है |जिसे नित्य शुद्ध जल से धो कर शिवलिंग पर पुनः स्थापित कर सकते हैं| 

शिव पूजन



शिव पूजन एक ऐसा पूजन है, जिसे बच्चा  ,बड़ा ,स्त्री, पुरुष सभी करना चाहते है| अधिकतर लोगों की जिज्ञासा होती है कि शिव की पूजा  कैसे से की जाये?इसके लिए ध्यान देने योग्य मुख्य बातें क्या है?वैसे तो ईश्वर की पूजा करना बहुत आसन है, जितना हम अपने सौन्दर्य पर ध्यान देते हैं, उतना ही प्रभु को सजा कर  कर रखें,उनके साथ बैठ  कर दो बोल बोले ,यही सच्ची  निष्ठां, एवम   पूजा है| किन्तु कुछ  लोग शास्त्रोक्त तरीके से पूजा करने की इक्षा रखते हैं|अतः हमें निम्न बातों को ध्यान रखना चाहिए-- 
ये थी कुछ उपयोगी मुख्य बातें किन्तु ये एक तथ्य सर्वोपरी है कि आत्मा से निकली हुई आवाज़ ही इश्वर तक पहुंचती है|अतः निःस्वार्थ भाव से हमें पूजा करनी चाहिए|  

रविवार, 20 दिसंबर 2009


समय की पहचान

समय एक ऐसा शब्द है,जिसे सोचते ही आँखों के सामने घड़ी का दृश्य उभर कर आता है| किन्तु क्या हमने कभी सही मायनों में सोचा है कि समय का क्या महत्त्व है| समय एक ऐसा दरिया है, जो हमेशा चलता रहता है|मैं अक्सर कहती हूँ  कि "Time is flying, we have to catch the time.Time will never wait."कहने का तात्पर्य यह है कि जो कार्य करना है,  उसे अच्छे तरीके से पूर्व योजना बना कर कर लेना चाहिए ,क्योकि समय से पूर्व किया गया नियोजित कार्य सफलता का सूचक है|कल  पर टालने वाला प्रत्येक कार्य कष्टकारी होता है|समय बीत जाने पर पछताने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है| समय की गति तेज़ है, हमें उसके साथ चलाना चाहिए|
ये तो समय की गति पकड़ने  की बात थी ,समय की एक और महत्वपूर्ण तथ्य है |वो यह है कि जो समय बीत गया वो वापस नहीं आता, उस समय की यादों को हमें केवल तब याद रखनी चाहिए, यदि वो किसे कार्य में मदद करें ,अथवा अनुभव बहुत अच्छा हो| हमें उस अनुभव को समय के साथ भुला देना चाहिए, जिनसे कष्ट प्राप्त हुआ हो या  यूँ कहें कि जिससे मन में कुंठा उत्पन्न होती हो|उस समय को हमें पीछे छोड़ देना चाहिए| उससे सीखना चाहिए, किन्तु उसको दिल में रख कर बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए क्योकि "समय होत बलवान "समय ही सबको अच्छा बुरा दिखाता है, कर्म का फल स्वयं प्रभु ही देता है|
मेरा ऐसा विश्वास है कि समय की सीमा को मत देखो, समय के साथ अपने  को परिवर्तित करो,बीते वक्त पर मत पछताओ ,उससे सीखो, भविष्य को वक्त के साथ सुन्दरता से सजाओ| तभी हम सफलता की ओर अग्रसर होगें|  

INTROSPECTION - A SECRET OF PROGRESS - स्वविश्लेषण



One big secret of success is self analysis ( स्वविश्लेषण ) of your own self . Introspection is a mirror to see your mind.It is to take stock of yourself and your habbits and thoughts and  to find out what stands in between you and your success and happiness. You need to weed out these habbits to firmly root your happiness.

Millions of people never analyze themselves. Mentally they are mechanical products of their environment , preoccupied with breakfast , lunch , dinner , working , sleeping and going here and there to be entertained . They do not know what or why they are seeking , nor why they never realize complete happiness and lasting satisfaction. By evading self analysis , people go on being robots , conditioned by the environment. True self analysis is the greates tool of progress.

Every one should learn to analyze himself dispationately. Find out what you are - not what you imagine you are !

स्वविश्लेषण द्वारा अपनी कमजोरियों को  जान कर उनमे निरंतर  सुधार कर के आप सच्ची सफलता और खुशियाँ प्राप्त कर सकते हैं |   

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

PEACE ACROSS THE WORLD


प्रभु कि  आस्था से ही  विश्व शांति संभव 

One of the most important thing that will help to eliminate world suffering – more than money , food , technology , houses or any other material aid – is to meditate and transmit to others the divine consciousness of God that we feel.

I believe a time will come when in greater understanding we shall have no boundaries anymore. We shall call the earth our country , and we shall , by a process of justice and international assembly , distribute unselfishly the goods of the world according to the needs of the people.



But equality cannot be established by force , it must come from heart …we must start now , with ourselves . We should try to be like divine ones who have come on earth again and again to show us and others the way. By our loving each other and keeping our understanding clear peace can come upon us and we can spread it seamlessly across the world.

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

TIME FOR GOD IN LIFE - जीवन में प्रभु के लिए समय


Everything has its place , but when you waste time at the cost of your true happiness it is not good.I dropped every unnecessary activity so that I could meditate and try to know God , so that I could always be in Gods devine consciousness.
It is not wrong to tell the lord that we want something , but it shows greater faith if we simply say : " Heavenly Father , I know that you  anticipate my need . Sustain me according to your will." If a person is eager to won a car,  for instance, and prays for it with sufficient intensity , he / she will recieve it.But possession of a car may not be the best thing for that person at that point in time and the lord may deny that wish. Trust more in God . Have trust that whatever happened happened for your good...जो इश्वर करता है अच्छे के लिए ही करता ऐसी  धारणा रखने चाहिए |
Have trust and believe that God who has created us will maintain us as well.

THE POWER OF GOD


Whenever we are in need we of any aid or assistance we take two approaches to satisfy those needs. First is the material help for example when we fall ill we go to doctor for curing it etc - let us call this human aid / help. But when we are in big trouble - serious illness , loss of job , accidents or any major calamity and no human aid or material help works we turn to almighty god for help. God is the spiritual power - maker of our body , mind and soul. Material power is limited and can be used only for small , trivial matters but when it fails , we turn to the unlimited Divine power. I believe for for long term peace and happinnes one should constantly have his / her mind and sould connected to the ALMIGHTY God.

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

Where There Is Light

Creating all round Succes


I read  a book& written some important & valuable part  in my previous  post.,same thing I am continuing in this post also hoping whoever will read definitely like it ,& will learn also.

. Succes is not a simple matter; it cannot be determinded merely by the amount of money and material possesions you have. The meaning of succes goes far deeper. It can only be measured by the extant to which your inner peace & mental control enable you to be happy under all circumstances. THat is real succes.


The Vaue Of Enthusiasm

1. Try to do little things in an extraordinary way.

2. If your work in life is humble, do not apoloze for it. Be proud because you are fulfilling the duty given you by the father. He needs you in your particular place; all people cannot play the same role So long as you work to please God, all cosmic forces will harmoniously assit you.

3.You should progress--- try tobe the very best inyour profession. Express the limitless power of soul in anything you take up........you must constantly create and produce new successes and not become automaton.All work is purifying if done with the right motive.

4. We should approach our nearest problem or duty with concentrated energy and execute it to perfection. This should be our philosophy of life.

5. 0In God's eyes nothing is large or small. Were it not for His perfect nicety in constructing the tiny atom, could the skies wear the proud structures of Vega, Arcturus ?Distinctions of "important" and "unimportant" are surely unknown to the Lord ,least, for want of apin ,the cosmos collapse!

Strength in Times of Adversity

Thought

Today  I read a book "Where There Is Light "by "Yoganandji." I thought if I m gaining some knowlge and learning so why not other people get chance to learn something. So I m writing some few points from that book.
 1. Never lrt life beat you down. Beat life! If you have a strong will you can overcome all difficulties.Affirm, even in the midst of trials: "Danger and I were born together, and I am more dangerous than danger!"This is a truth you should always remember; apply it and you will see that it works. Don't behave like a cringing mortal being. You are a child of God!!

2. Many people are afraid of life's problems. Ihave never feard them, for Ihave always prayed: "Lord may Thy power increase in me. keep me in the positive consciousness that with Thy help I can  always overcome my difficulties.."

3. Saint Francis had more troubles than you could imagine, but he didn't give up. One by one, by the power of mind, he overcome those obstacles and became one with the Master of the Universe. Why shouldn't you hahe that kind of determination?

4. To fly away from problems may seem the easiest solution.But you gain strength only when you wrestle with a strong opponent. One who dorsn't have difficulties is one who doesn't groe.

5.When you use life's experiences as your teacher, and learn from them the true nature of the world and your part in it, those experiences become valuable guides to eternal fulfillment and happiness.

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009


कर्म ही असली पूजा है

कर्म ही पूजा है ,किन्तु आजके युग में हम ये सोचते हैं कि यदि ईश्वर के आगे बैठ कर हमने पूजा नहीं  की तो ईश्वर हमारी नहीं सुनेगा| लेकिन ये वास्तविकता नहीं हैं| यहाँ हमें निराला जी की कविता याद आती है ,"प्रियतम जिसका अर्थ एवम सार कुछ इस प्रकार था,कि एक बार नारद मुनि हरी का गुणगान करते हुए  क्षीर सागर पहुंचे वहाँ उन्होंने प्रभु से पूछा ,कि आप ये बताइए कि आपका सबसे प्रिय भक्त कौन है ?नारद मुनि को यह आशा थी कि प्रभु उनका नाम लेगें किन्तु हरी ने उत्तर दिया कि धरती  पर रहने वाला एक किसान |नारद मुनि को आश्चर्य हुआ ,तब भगवान   ने कहा कि ठीक है तुम एक तेल से भरा  पात्र लेकर पृथ्वी  की पूरी परिक्रमा कर के आओ ,ध्यान रखना कि तेल का एक बूँद गिरने न पाए |नारद मुनि ने ठीक वैसा ही किया , और परिक्रमा पूरी कर के वापस आये एवम हरी को बताया कि तेल की एक बूँद भी नहीं गिरी अब बताइए कि आप का प्रिय भक्त कौन है ?प्रभु ने फिर वही जवाब दोहराया कि किसान ?अब नारद मुनि से रहा नहीं गया वो बोले कि मैं हरी गान हर वक्त करता हूँ एवम आपने जैसा कहा उसी तरह मैने परिक्रमा भी की फिर भी आप किसान को ही असली भक्त कह रहें है ? जबकि वो केवल आपका दिन में  तीन बार ही नाम लेता हैं |तब प्रभु ने पूछा किजब तुम परिक्रमा कर रहे थे तब तुमने मेरा कितनी बार नाम लिया ,नारद मुनि ने कहा कि प्रभु वो तो मैं आपका ही कार्य कर रहा था | 
अब प्रभु ने कहा किसान जो कार्य करता है ,अपने परिवार की जीविका चलाता है ,वो भी हमारे द्वारा दिया गया कार्य है किन्तु वो उसमें से समय निकाल कर वो मेरा नाम लेता है इसलिए वो मेरा प्रिय भक्त है| "
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हम कार्य को पूजा समझें और ईश्वर में आस्था रक्खें तो ईश्वर भी साथ देगा और कार्य पूर्ण होने से हमारे मन की स्थिति भी अच्छी होगी ,शांति का जीवन होगा|

रविवार, 13 दिसंबर 2009

MENTAL PEACE ( मानसिक शांति )


Given below are some principles to achieve Mental Peace - मानसिक शांति के सिद्धांत
 1. Mind Your Own Business -
 Most of us create our own problems by interfering too often in others' affairs. Mind your own business and you will keep your peace.
2. Forgive And Forget:
This is the most powerful aid to peace of mind. Forgive,Forget, and march on. Love flourishes in giving and forgiving.
3. Do Not Crave For Recognition:
This world is full of selfish people. They seldom praise anybody without selfish motives. Do your duties ethically and sincerely.
4. Do Not Be Jealous: - ईर्ष्या
 Jealousy disturbs our peace of mind the most. Jealousy will not get you anywhere; it will only take away your peace of mind.
5. Adjust To The Environment:
If you try to change the environment single-handedly, the chances are you will fail. Instead, change yourself to suit your environment.
6. Work within your limitations:
We often tend to take more responsibilities than we are capable of carrying out. This is done to satisfy our ego. Know your limitations. . Why take on additional loads that may create more worries?
7. Meditate Regularly: - प्रभु  का ध्यान  
Meditation calms the mind and gets rid of disturbing thoughts. This is the highest state of peace of mind. Try and experience it yourself.
8. Keep Yourself Occupied:
An empty mind is the devil's workshop. Keep your mind occupied in something positive, something worthwhile . Actively follow a hobby. Do something that holds your interest.
9. Avoid Indecisiveness :
Do not waste time in protracted wondering " Should I or shouldn't I?" Days, weeks, months, and years may be wasted in that futile mental debating. You can never plan enough because you can never anticipate all future happenings. Value your time and do the things that need to be done.
10. Believe in Destiny:
Do not keep worrying about what has happened .Take things in your stride and have mindset that whatever
happened was destined to happen only that way.


जो  होता  है अच्छे के लिए होता है , यह सिद्धांत सबसे ज्यादा मानसिक शांति प्रदान करता है |

आखिर मैं ही राजा विक्रमादित्य क्यों हुआ ?
  


एक बार राजा विक्रमादित्य के मन में यह जानने की इक्षा हुई कि आखिर   मैं ही राजा क्यों हुआ | उन्होंने मंत्रियों एवम राजपुरोहितों को बुला कर अपने दिल की बात सबके समक्ष रखी और बोला कि जो भी मेरे प्रश्न का जवाब देगा , उसे मैं स्वेक्षा से बहुत इनाम दूगाँ| रजा के प्रश्न सुनने के पश्चात सभी इसका उत्तर ढूंढने में लग गये, धीरे धीरे महीनों बीत गया, किन्तु प्रश्न का उत्तर न मिल पाया| राजा ने फिर से राजपुरोहित को बुलया,और पूछा किआपने मेरे  प्रश्न का उत्तर अभी तक नहीं दिया है |मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर तत्काल चहिये |आप दो दिन के अन्दर ये बताइए कि आखिर मैं ही राजा क्यों हुआ? राजपुरोहित चिंताग्रस्त घर वापस आया, वो बहुत परेशान था|राजपुरोहित के साथ उसकी विधवा बहु रहती थी, उसने राजपुरोहित से पूछा ,कि पिताजी आप चिंताग्रस्त क्यों है? राजपुरोहित ने अपनी चिंता का कारण उसे बताया |तब उसकी बहु ने कहा कि आप परेशान मत होइए ,इस प्रश्न का उत्तर मैं राजा को दूगीं|राजपुरोहित असमंजस में थे, कि मैं अपनेघर की बहु को राजमहल कैसे ले जाऊं? किन्तु बहु ने आग्रह किया और साथ ही राजपुरोहित के पास इसके अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं था, वो राजमहल अपने बहु के साथ गए |
वहाँ सभी आश्चर्यचकित थे |राजा के प्रश्न दोहराने पर वो महिला बोली कि हे राजन आप यहाँ से सौ योजन दूर दक्षिण की तरफ जाओ,वहाँ एक साधू आग कहा रहा होगा वो आपके प्रश्न का जवाब देगा |राजाने शुक्रिया कहा एवम दुसरे दिन दल बल के साथ अपने प्रश्न के उत्तर की तलाश में बताये हुए स्थान की तरफ निकल पड़े| ठीक बताये हुए स्थान पर वो साधू मिला, और उसने आगे का मार्ग बतया कि आगे सौ योजन दूरी पर एक और साधू मिलेगा जो अपने शरीर का मांस खा रहा होगा ,वो आपके प्रश्न का जवाब देगा | राजा वहां से फिर आगे की ओर प्रस्थान किया, उन्हें वो साधू मिला ,वो देखते ही बोला राजन तुम अपने उत्तर की तलाश में आगये किन्तु मैं भी इसका जवाब नहीं दूंगा |तुम्हें आगे जाना होगा एक राज्य मिलेगा वहाँ एक बच्चे को जन्म लेना है किन्तु उसकी आयु कुछ ही घंटों की है वो आपके प्रश्न का जवाब देगा वहाँ से आपको सबका उद्धार करना है वहाँ से आपको कहीं नहीं जाना पड़ेगा |राजा इतना सुनकर उस राज्य की तरफ बढ़े |वहाँ एक बच्चे का जन्म हो चुका था, राजा ने वहाँ सारी बात बताई ,तब वहाँ के राजा ने कहा कि लिखंत को कोइ  टाल नहीं सकता यदि आपके प्रश्न का उत्तर मिलता है तो आप जरूर पूछीये, इतना कह कर उन्होंने  बच्चे को बुलवाया, बच्चे ने  तुरंत कहा राजन आपने थडी देर कर दे है ,अब मेरे जाने का वक्त हो गया है, किन्तु ये मुझे जंगल में दफनायेगें आप रात बारह बजे आना मैं आपको को बताऊंगा  कि आप ही राजा कैसे बने ?राजा विक्रमादित्य का सब्र का बाँध उनमें समां नहीं रहा था, किन्तु वो रात तक प्रतीक्षा की एवम रात्री में बताये हुए स्थान पर पहुंच कर मृत शरीर को निकाला, बालक की मृत शरीर में एक बार फिर चेतना आई और उस  बालक ने बताना शुरू किया कि पिछले जन्म के कर्म का ये फल है जो हम लोग भुगत रहें है |तुम तीन लोग के जरिये यहाँ तक पहुंचे अर्थात हम चार लोग हुए ,हम चरों पूर्वजन्म में भाई बहन थे |एक बार भोजन का संकट हुआ हम लोगों के पास एक एक रोटी थी, हम लोग भोजन करने जा रहे थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई, सबसे बड़े भाई जो कि आग खा रहें हैं उन्होंने दरवाज़ा खोला देखा साधू भोजन की इक्षा जता रहा है, तो उन्होंने झिडकते हुए कहा कि मैं  तुमको रोटी देदूं तो क्या मैं आग खाऊं? तो वो इस जन्म में आग खा रहें हैं |दुसरे भाई ने कहा कि यदि मैं तुमको रोटी दे दूं तो क्या मैं अपना मांस खाऊं? उनका वो वचन सत्य हुआ और वो इस जन्म में अपना मांस खा रहें हैं |मैं तीसरा भाई था जिसने ये कहा कि तुमको रोटी देकर क्या मैं जन्मता मारता रहूँ ?यही कारण है कि मे जन्म लेकर मर जाता हूँ |जो स्त्री आपको मिली थी वो हमारी बहन थी, उसने आधी रोटी दिया था इसलिए वो आधा सुख भोग रही है |राजन आप सबसे छोटे थे किन्तु आपने अपनी पूरी रोटी उस साधू को दिया ,साधू ने आपको ढेरों आशीर्वाद दिया और यही कारण है कि आज आप राजा है और हम सभी अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं ,राजन अब हमारे जाने का समय होगया है किन्तु आपसे निवेदन है कि आप हमें मुक्ति दिलाओ क्योकि यह कार्य केवल आप ही कर सकते हो |इतना कहने के पश्चात् वो शरीर फिर मृत हो गया| राज वापस राज्य को आ कर सबका उद्धार कराया |सबको मुक्ति मिली |
कहने का तात्पर्य यही था कि इश्वर कभी भी प्रत्यक्ष नहीं आयेगे हमें उन्हें पहचानना होगा |इसलिए इश्वर का रूप सब में दे |

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

झूठा अहंकार

आजकल भाग दौड़ की जिन्दगी में हम अक्सर भूल जाते हैं कि जितना हमें अपने बराबर वालों को या फिर अपने से उच्च वर्ग को हमें  मान सम्मान देते हैं,उतनाही हमें अपने से निम्न वर्ग को भी मान देना चाहिए|  उदाहरण  के तौर पर किसी का घर तैयार  होता है उस महल को बनाने के लिए न जाने कितने मजदुर सर्दी ,गर्मी ,बरसात, प्यास भूख सह कर आलिशान बंगले को तैयार करते हैं किन्तु बाद में उधर से जब वो गुजरते हैं तो वो मजदूर तो  पहचान जाता है कि इस महल के लिए उसने पसीना बहाया था किन्तु मालिक उसे न तो पहचानता  है और न पहचानना चाहता है |इसके लिए चंद शब्द कुछ ऐसे कहे जा सकते हैं जो की एक महिला मजदूर की दशा को बयाँ करती हैं- 


वह थी महिला मजदूर ,काम करने को थी वो मजबूर, 
सुबह से शाम,पीठ पर बच्चे को बांध,
वो सिर पर बालू  गारा ढोती थी,दिन भर पसीना बहाती थी,
 हर रोज़ वही सुबह होती थी, वही कार्य वो दोहराती थी,
क्योकि वो थी भूख से मजबूर ,वो तो थी एक महिला मजदूर |
दिन बीते, महीने बीते, नया घर हो गया तैयार ,
सुन्दर था बड़ा था, दरवाज़े पर नाम लिख था ,
"मधुमती विशाल विहार" 
घर को देख सब वाह-वाह करते थे, घर के मालिक को बधाई  देते थे,
मालिक को हो गया गुरूर ,वो भूल गया कि इसे जिसने बनाया, 
वो सब थे मजबूर ,उसमें वो भी एक थी महिला मजदूर|
एक दिन वही महिला उधर से निकली,घर को देख कर ठिठकी ,
मन में सोच रही थी वो, इसको बनाने में कितना पसीना बहाया, 
तभी दरबान ने उसको धक्का दे कर वहाँ से भगाया ,
उसने घर के पालतू कुत्तों को भी देखा ,
वो पल्लू से पसीना पोछती, आखों के नीर को सूखती, 
 वो वहाँ से चल पडी ,बस मन में सोच रही थी ,
उसकी क्या है पहचान ,वो तो हर तरफ है अंजान, 
वो तो मजबूर थी, क्योकि वो तो केवल एक मजदूर थी...........

त्रिदेवों के प्रतिरूप - भगवान दत्तात्रेय


त्रिदेवों के प्रतिरूप - भगवान दत्तात्रेय 


श्री दतात्रेय भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं | मुनि अत्रि और महान योगिनी अनसूया माता के पुत्र दत्त के त्रिमूर्ति रूप देख साक्षात्  ब्रम्हा , विष्णु , महेश के दर्शन होते हैं | त्रिदेवी अर्थात सावित्री , लक्ष्मी और पार्वती के पातिव्रत्य अहंकार शमनार्थ त्रिदेवों ( ब्रम्हा , विष्णु और शिव ) के इच्छाभोजन   के लिए श्री दत्त का अवतार हुआ है |
देवी अनसूया महान तपस्विनी थीं | एक बार त्रिदेव उनके कुटिया पर पधारे और विवासन भोजन  के इच्छा प्रकट कि | विवासन अर्थात विकार- वासना विरहित भोजन  की बात सुनकर अचंभित अनसूया ने अपनी आंख मूंदकर ध्यान किया | त्रिदेव अतिथियों को उन्होंने अपने तपोबल से शिशु बनाया और मात्र्तव का अमृत पिलाया | त्रिदेव इच्छाभोजन से तृप्त हो गए और उन्हीं  की कृपा से अनसूया को चंद्रमा , दत्त एवं दुर्वासा पुत्ररत्न प्राप्त हुआ | तीन देवों के कार्य प्रथक रूप से होते हैं किन्तु अनसूया के तपोबल एवं मात्र्भाव से त्रिदेव एकरूप हो गए  |
पृथ्वीतल पर शांति प्रस्थापित करने के लिए भगवान श्री दत्तात्रेय ने सर्वत्र भ्रमण किया | एकांत प्रेमी श्री दत्त औदुम्बर वृक्ष के नीची बैठकर सृष्टि नियमों की चिंतन करते थे | परोपकार और ईमानदारी इन दो गुणों के रूप में उनका साथ गाय और श्वान  होते थे | युवावस्था में हे परम विरागी , अगाध ज्ञानी होते  हुए भी संयमी और विश्वशांति के प्रवर्तक  श्री दत्त शांत और संयमी युवावस्था के महान आदर्श हैं | 

DHARMABAL - धर्मबल

Dharmabal is the biggest force.For those who have such a force with them , the worldly force is meaningless.If you are with Dharma you do not need to fear anything , you do not need to fear anybody. We should always move on path of Dharma even if lakshmi leaves and we have fear of becoming poor.If we walk on the path of Dharma , Dharmaraj will be with us and wherever Dharmaraj stays ,there stays Narayana and lakshmi and all God and Goddess too.


Those who oppose Dharma  get destroyed in long run.

There are three stages of people :Uttam (उत्तम ) or superior , madhyam ( मध्यम ) or middle standard and Adham (अधम ) or inferior.The adham people always think , "can I do that great work ? Shall I do ? No,perhaps , I will not be able to do great work ". They always avoid such work. The madhyam people come forward , associate themselves to do great work but when obstacles come , they dissociate themselves from the great work . The Uttam people always participate in great work.Such people cannot walk away from the path of Dharam even if there are huge obstacles. They are always victorious. 

So to be successful and victorious one should always stick to the path of Dharma.

सही शुरुआत सही परिणाम



सत्संग,कीर्तन, महापुरुषों, का साथ इतना सब कुछ करने के पश्चात भी आत्मा को सुख नहीं मिलता ,शांति नहीं मिलती | इसका कारण हम खोज नहीं पाते  ईश्वर  को दोष  देते  हैं| किन्तु व्यक्ति अपने में नहीं झांकता| उसे नहीं मालूम कि  दोष कहाँ हैं | दोष हमारे  शुरुआत में ही होती हैं| जैसे पौधा जब छोटा होता है ,माली उसके भरण पोषण के लिए अच्छी खाद मिटटी डालता है ,धुप पानी पर्याप्त मात्रा में  डालता है |इसी प्रकार भोजन बनाने के लिए भी शुरुआत से ही पूरी तैयारी करनी होती है अन्यथा भोजन स्वादिष्ट नहीं बनता ,इस प्रकार के तमाम उदाहरण हैं जो कि दर्शाते हैं कि जीवन में कोई भी कार्य करके शांति पाने के लिए या फिर यूँ कहें कि उसे पूर्ण करने के लिए हमें प्रारम्भ से ही सोच शुरू करनी चाहिए |इश्वर की भक्ति अराधना सत्सगती दूसरों के लिए सेवाभाव अपने दैनिक कार्य के साथ करना चाहिए जो की आगे जब हम वृधावस्था की तरफ अग्रसर होगें  तब यही आदत हमारी दिनचर्या बनेगी एवम सत्संग तथा महापुरुषों के साथ से आत्मा को शांती मिलेगी |साथ ही प्रवचन तभी सार्थक होगा जब हम उसे अपने जीवन में उतारेगे |

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

    जीवन का असली सत्य एवं सुख                     

जीवन और मरण दुनिया का एक ऐसा सत्य है जिसे मिथ्या  कहा नहीं जा सकता किन्तु इस सत्य को कोई अपनाने को तैयार नहीं होता|सभी जानते हैं कि यहाँ से लेकर कुछ नहीं जाना है फिर भी इस माया जाल में इतना उलझते हैं कि रिश्ते नाते,कर्म, फर्ज, माता-पिता, बंधू-बांधव सब भूल जाते हैं| केवल पैसा स्वयं के लिए किसी भी हद तक गिर कर कमाने को तत्पर रहते हैं| लेकिन इन्सान ये क्यों भूल जाता है कि वो मुट्ठी बंद करके जन्म लिया था अर्थात किस्मत अपने साथ लेकर आया था, लेकिन जब वो इस दुनिया से  जाता है तो हाथ खुला होता है अर्थात वो यहाँ से कुछ नहीं लेकर जा रहा है यहाँ तक कि ये शरीर भी छोड़ कर जाता है|
  मेरा ऐसा विश्वास है कि यदि मनुष्य  में ये चेतना आ जाये कि केवल पैसा ही सब कुछ नहीं होता, रिश्ते की अहमियत समझाना, माता-पिता की सेवा करना, दूसरों के दुःख दर्द बाटना, भी उतना जरूरी है जितना कि पैसा कमाना तो मनुष्य सुखी हो जायेगा, उसे कोई कष्ट न होगा,क्योकि मनुष्य जिन्दगी  का असली सत्य समझ लेगा|
बच्चे मन के सच्चे
कहते हैं की इश्वर बच्चों की पुकार ,बच्चों की अरदास सबसे पहले सुनता है ,आखिर क्यों? ये प्रश्न सबके दिल में होता है किन्तु उत्तर कोई नहीं जानता |इश्वर इसलिए बच्चों की आवाज को सुनता है क्योंकि बच्चे दिल के साफ होते है उनका दिल निर्मल पानी की तरह ,शीशे की तरह पारदर्शी  होता है, उनके मन में खोट नहीं होती, इसलिए उनके दिल से निकली हर आवाज प्रभु तक आसानी से पहुँच जाती हैं |बच्चों में अहं की भावना भी नहीं होती |उनकी मांग भी एक सिमित दायरे की होती है, जबकी हम बड़े यही सोचते हैं कि हम से बड़ा दूसरा कोई न हो, जो कुछ मुझे प्राप्त हो दुसरे के पास न हो| सब मेरी ही तारीफ करे| ऐसे में जरा सोचो प्रभु कहाँ  सुन पायेगा क्योकि हमारी आवाज तो हमारे अहंकार में ही खो गयी वो तो प्रभु तक पहुंच ही नहीं पाई ,इसलिए दिल को हम साफ रखेगें ,निःस्वार्थ ,निष्पाप मनसे जबहम प्रार्थना करेगें तो हमारा भी अरदास सुनेगा  जैसा कि वो बच्चों की सुनता है |

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

ईश्वर की इक्षा सर्वोपरी होती है

आपन सोचा होत नहीं, हरी चेता तत्काल  ,
बलि चाह आकाश को, भेज दियो पाताल |
ये पंक्तियाँ एकदम सत्य दर्शाती है की केवल सोच लेने से ही ईश्वर के दर्शन नहीं प्राप्त हो जाता | कभी कभी व्यक्ति धार्मिक स्थान पर जन्म से ले कर अंतिम क्षण तक वहीं रहता है किन्तु उस स्थान का पुण्य नहीं प्राप्त कर पता क्योकि हरी का आदेश नहीं  होता, इश्वर की इक्षा नहीं होती | काशी, प्रयाग, हरिद्वार जैसे स्थान पर जन्म लेकर भी वहां की पवन स्थान का परम सुख नहीं प्राप्त कर सकते, जबकि देश विदेश से लाखों पर्यटक पूर्णतः इसका सुख प्राप्त करते हैं कहने का तात्पर्य यह है हम केवल अपनी इक्षा से ईश्वर दर्शन का सुख नहीं उठा सकते जब तक प्रभु की इक्षा उसमें न हों | जब प्रभु की इक्षा होती है तो बिना किसी बाधा के दूर से पास तक सभी धाम का दर्शन बिना किसी बाधा के हो जाता है | ऐसा मेरा परम विश्वास है | कहने का अर्थ यही है की सर्वप्रथम इश्वर से प्रार्थना करो तथा सच्चे मन से विनती करो जिससे कार्य सफल हो | 

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

पुण्य से कहीं महतवपूर्ण होता है प्रेम

इस दुनिया में ज्यादातर लोगों का अपना एक लक्ष्य होता है। मंजिल के मुताबिक हर व्यक्ति अपना मार्ग चुनता है | चूंकि सब जल्दी में हैं   इसलिए जिस रास्ते पर देखो, लोग दौड़ते हुए नजर आते हैं। बाहरी दुनिया में तेजी का महत्व है और भीतर के संसार में धीमी गति की महत्ता है।


इनमें से कई लोगों का लक्ष्य परमात्मा भी है और जो लोग ईश्वर को जल्दी पाना चाहते हैं, वे शार्टकट भी ढूंढ़ते हैं। ऐसा ही एक लघु मार्ग है दान। दान में सहयोग की भावना होनी चाहिए, न की पुण्य अर्जन की। आदमी इस चक्कर में है कि दान करके पुण्य कमाओ और पुण्य की पूंजी से परमात्मा अपने वश में हो जाएगा।

दान एक हथियार बन जाता है। दानशीलता ने अहंकार और दीनता दोनों को जन्म दिया है। दोनों ही भक्ति के लिए खतरनाक हैं । यह वृत्ति सांसारिक जीवन में भी आदमी को बहकाती है क्योंकि सारा दान पुण्य के लिए किया जाता है, जबकि परमात्मा की राह में दान का मार्ग बहुत सफल नहीं कहा जा सकता।

इसीलिए संतों ने कहा है कि यह जरूरी नहीं कि जो चल पड़ा है, वह परमशक्ति तक पहुंच ही जाएगा। बारीकी से देखा जाए कि चल किस नीयत से रहे हैं। दान के पुण्य की गठरी सिर पर लादकर चलने वाले पैरों में लड़खड़ाने की संभावना बढ़ जाती है।

पुण्य अहंकार के बोझ को और बढ़ा देता है। इसलिए लक्ष्य निर्धारण के बाद जो भी मार्ग चुनें, उसमें अहंकार से बचें। दान-पुण्य के हिसाब-किताब से दुनिया में प्रतिष्ठा तो मिल सकती है, लेकिन परमात्मा मिल जाए, यह जरूरी नहीं है।

परमात्मा पुण्य नहीं प्रेम का विषय है। इसलिए लक्ष्य व्यावहारिक हो या आध्यात्मिक दोनों में ही श्रेष्ठ पथ है प्रेम का पथ, जहां दान में दया का महत्व है, पुण्य का नहीं।

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

बलिदान का सही अर्थ


जय माँ दुर्गे 
बलिदान का अर्थ न समझ सकने के कारण अनेक देवी भक्त पशु बलि देना अपना कर्तव्य  समझते हैं  | परन्तु बेचारे भोले मनुष्य पशु बलि का अर्थ न समझने के कारण व्यर्थ ही जीव हत्या का पाप अपने सिर ले लेते हैं | उससे देवी की प्रसन्नता तो दूर , उल्टा अपराध और अप्रसन्नता ही प्राप्त होती है | 
विवेकीजन काम , क्रोध , लोभ , मोह रुपी पशुओं की विवेक बुद्धि रुपी तलवार के द्वारा काटकर अन्य प्राणियों तथा अपने को सुखदायक निर्विषय रूप मांस भक्षण करते  हैं | 
काम  और क्रोध रुपी दोनों विघ्न उपस्थित करने वाले पशुओं का बलिदान करके ही जप करना श्रेयस्कर है |
इससे स्पष्ट हुआ कि आचार्यों ने काम - क्रोधादि मानसिक विकारों को ही पशु माना है | उपनिषद् का भी यही मत कि काम क्रोध लोभादिक ही पशु है | बलिदान के नाम पर पशु-वध करने को अनुचित बताया गया है |
हम में से जो भी याजक यज्ञ  में पशुवध करते हैं , वे निश्चय  ही अत्यंत अन्धकार में बढ़ते जाते हैं , क्योंकि   हिंसा नाम से कभी कोई धर्म न हुआ है न होगा | जो मनुष्य जिस बकरे का वध करता है , वही बकरा परलोक में तलवार ग्रहण करके उसे उसी प्रकार मारता है |
भगवती पार्वती जी ने स्वयं अपने श्रीमुख  से जीवहत्या करने वालों की दुर्गति का वर्णन किया है |हे शंकर ! स्वयं फल की कामना करने वाला  होकर तथा अज्ञान के द्वारा मोह  को प्राप्त होकर जो मनुष्य मेरे नाम से अनेक प्रकार के जीवों की हत्या करता है , उसका राज्य , वंश , संपत्ति , बंधू , बांधव स्त्री आदि समस्त ऐस्वर्ये कुछ समय में ही नष्ट हो जाता है तथा वह स्वयं भी मर कर नरक को प्राप्त होता  है | 

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

भार्तिहरी के नीति शतक

नीतिशतक के कुछ हिंदी अनुवाद       

बुद्धिमान जन ईर्ष्या से ग्रस्त रहते हैं, अधिकारी जन घमंड में चूर है, अन्य लोग अज्ञान से पीड़ित हैं ऐसे मे ज्ञान की सूक्तियां एवं समझदारी की बातें किससे करे वो तो मन मे ही गल सड़ जाती हैं |


अबोध को आसानी से समझाया जा सकता है; ज्ञानी को इशारा ही काफी है अंशमात्र ज्ञान से ही जो स्वयं को परम ज्ञानी मान बैठा है उस आदमी को ब्रह्मा भी संतुष्ट नहीं कर सकते | 


घड़ियाल के मुख के बीच से मणी को साहस कर के निकाला जा  सकता है, वेगवती लहरों से उफनते समुद्र को भी तैर कर पर कर सकते है, किन्तु दुर्गुणों मे फंसे मूर्ख आदमी के चित्त को सदगुणों की ओर मोड़ना आसन नहीं |


जब मैं थोडा- थोडा समझदार हुआ तो हाथी की तरह घमंड मे चूर रहने लगा. तब मेरा मन भ्रम से लिप्त हो गया की मैं तो सर्वज्ञ हूँ. जब बुद्धिमानों की संगती से थोडा थोडा जानने के योग्य  हुआ तब 'मैं तो निपट मूर्ख हूँ' यह जानकर मेरा सारा दर्प ज्वर के समान उतर गया |


अपनों के साथ सद्व्यवहार करना, सेवको के साथ दया- भाव रखना, बुरों क्र साथ कठोरता, सज्जनों से अनुराग, राज्यद्जिकारियों के साथ न्याय -नीति का व्यवहार, विद्वान् लोगों के साथ निश्चलता, शत्रुओं के साथ बहादुरी, बड़ों  के साथ विनम्रता और महिलाओं के साथ शिष्टता ऐसी कलाओं मे जो भी निपुड है उन्हीं पर संसार टिका हुआ है |

रविवार, 29 नवंबर 2009

ज्योतिष क्या है ? What is Astrology ?


This is my 100th Post.




ज्योतिष उस विद्या का नाम है , जिसके द्वारा आकाशीय ग्रहों के माध्यम से भूत , भविष्य और वर्तमान का हाल जाना जा सकता है | ज्योतिष शास्त्र  का अपर नाम ज्योति शास्त्र  भी है | ज्योति शास्त्र का अर्थ हुआ - प्रकाश देने वाला शास्त्र | अर्थात वह शास्त्र जो संसार के सुख - दुःख , जीवन मरण एवं ब्रह्मांड जैसे विभिन विषयों पर प्रकाश डालकर उन्हें उजागर करने के क्षमता  रखता है |

सौर मंडल में सूर्य , चन्द्र , मंगल आदि ब्रम्हांडीय पिंडों को ज्योतिष या ज्योतिष्क  कहा जाता है |

ज्योतिष के उत्पत्ति कब हुई , इस विषय में निश्चत  रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता | किन्तु , इसके प्राचीनता इस बात से सिद्ध होती है की संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ "वेद " मानें जातें हैं ; और ज्योतिष वेदों का अंग है |
वेद के छह अंग हैं - शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , छंद   एवं ज्योतिष |

संसार की  प्रत्येक वस्तु तथा प्राणी गृह नक्षत्रों के प्रभाव से पूर्ण  प्रभावित हैं |  ज्योतिष शास्त्र की सहायता से भूत , भविष्य एवं वर्त्तमान का ज्ञान प्राप्त कर अपने प्रयत्नों द्वारा वर्तमान तथा भविष्य के जीवन को प्रभावित एवं परिवर्तित भी किया जा सकता है | अतः यह शास्त्र जो होना है वह होगा ही पर आश्रित केवल भाग्यवादी बने रहने के लिए नहीं कहता , अपितु भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वाभास होने पर उनसे बचने , उन्हें बदलने या मिटने के लिए प्रयत्नशील होने की प्रेरणा भी देता है |

इस प्रकार ज्योतिष  शास्त्र भाग्य और कर्म के समन्वय का सेतु है |
ज्योतिष द्वारा अपना भविष्य जानने के लिए किसी  विद्वान ज्योतिषाचार्य को ही अपनी कुंडली दिखाना चाहिए तथा परामर्ष लेना चाहिए अन्यथा लोग हमेशा भ्रमित रहेगे | 

शनिवार, 28 नवंबर 2009

दक्षिणावर्ती शंख का महत्त्व



एक बार भगवान विष्णु जी ने लक्ष्मीजी से पूछा कि आपका निवास कहाँ कहाँ होता है ? उत्तर में लक्ष्मीजी ने कहा - लाल कमल , नील कमल , शंख , चंद्रमा और शिवजी में मेरा निवास होता है | लक्ष्मीजी और शंख दोनों ही समुद्र से उत्पन्न हुए  हैं | इसलिए शंख को लक्ष्मीप्रिया , लक्ष्मी भ्राता , लक्ष्मी सहोदर आदि  नामों से जाना जाता है | अतः यह दोनों भाई बहिन हैं | शंख बहुत प्रकार के होतें हैं , लेकिन प्रचलन में मुख्य रूप से दो प्रकार के शंख है | प्रथम वामवर्ती शंख , दूसरा दक्षिणावर्ती शंख | वामवर्ती शंख का पेट बांयी ओर को खुला होता है |तंत्र शास्त्र में वामवर्ती शंख की अपेक्षा दक्षिणावर्ती शंख को विशेष महत्त्व दिया गया है | यह शंख वामवर्ती  शंख के विपरीत इनका पेट दायीं ओर खुला होता है | इस प्रकार दायीं ओर की भंवर वाला शंख " दक्षिणावर्ती " कहलाता है |
प्रायः सभी दक्षिणावर्ती शंख मुख बंद किये होते हैं | यह शंख बजाये नहीं जाते हैं , केवल पूजा रूप में ही काम में लिए जाते हैं | शास्त्रों  में दक्षिणावर्ती शंख के कई लाभ बताये गए है :-

  • राज सम्मान की प्राप्ति


  • लक्ष्मी वृद्धि


  • यश और कीर्ति वृद्धि


  • संतान प्राप्ति


  • बाँझपन से मुक्ति


  • आयु की वृद्धि


  • शत्रु भय से मुक्ति


  • सर्प भय से मुक्ति


  • दरिद्रता से मुक्ति

दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर उसे जिसके ऊपर छिड़क दिया जाये . वह व्यक्ति तथा वस्तु पवित्र हो जाता है |

क्यों होती है गणेशजी एवं लक्ष्मी जी कि संयुक्त पूजा


ॐ गणेशाय नमः
 एक समय की  बात है वैकुंठ  धाम में भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी विराजमान होकर आपस में वार्ता कर रहे थे | माता लक्ष्मी श्री हरी जी से कह रहीं थीं  कि किस प्रकार वे  दुनिया में सब से अधिक पूजनीय एवं श्रेष्ठ हैं |लक्ष्मी जी को इस प्रकार अपनी  प्रशंसा  करते सुन भगवान विष्णु जी को अच्छा नहीं लगा और उनका अहं कम करने के लिए उन्होंने कहा " तुम सर्व संपन होते हुए भी आज तक माँ का  सुख प्राप्त नहीं कर पाई " | इस बात को सुन कर माँ लक्ष्मी को बहुत दुःख हुआ और वो  अपनी  पीड़ा सुनांने अपनी  प्रिय सखी माँ पार्वती के पास गयीं और उनसे विनती की जिससे वो अपने पुत्र कार्तिकेय और गणेशजी में से किसे एक को उनको दत्तक  पुत्र के रूप में प्रदान कर  दें | माँ पार्वती गणेश भगवान को माँ लक्ष्मी को दत्तक पुत्र के रूप में देने का स्वीकार कर लिया | विष्णु प्रिय लक्ष्मी ने माँ पार्वती से कहा की "आज से मेरी सभी सिद्दिधियाँ , सुख संपत्ति मैं अपने पुत्र गणेश  जी को प्रदान करती  हूँ एवं मेरी पुत्री के समान प्रिय रिध्धि और सिध्धि जो के ब्रह्मा जी के पुत्रियाँ हैं , उनसे गणेशजी का विवाह करने का वचन देती हूँ | सम्पूर्ण  त्रिलोकों में जो व्यक्ति , श्री गणेश जी कि पूजा नहीं करेगा और उनकी  निंदा करेगा मैं उनसे कोसों दूर रहूँगी | जब भी मेरी पूजा कि जाएगी उसमे गणेश जी की  पूजा अवश्य होगी | 

ऐसे हुए भगवान गणेश एकदन्त


श्री गणेशाय नमः |

आप जब भी भगवान श्री गणेश जी की कोई प्रतिमा देखेंगे तो उसमे पाएंगे कि उनका एक दन्त खंडित है | उनके एकदंती होने के पीछे एक कथा है | इस कथा के अनुसार तीनों लोकों की क्षत्रिय  विहीन करने के पश्चात परशुराम जी अपने गुरुदेव भगवान शिव जी और गुरु माता से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे | उस समय भगवान शिव जी विश्राम कर रहे थे और भगवान श्री गणेश जी द्वार पर पहरेदार के रूप में बैठे थे | द्वार पर भगवान श्री गणेश को देख कर परशुराम जी ने उन्हें नमस्कार किया और अन्दर के ओर जाने लगे , इस पर भगवान श्री गणेशजी ने उनको अन्दर जाने से रोका | धीरे धीरे  दोनों के मध्य विवाद बढ़ता चला गया | परशुराम जी ने अपने अमोध फरसे को  , जो की उनको श्री शिव भगवान ने दिया था , चला दिया | फरसे के वार से भगवान गणेश जी का एक दन्त खंडित हो गया | तब से भगवान गणेशजी एकदंत के नाम से भी जाने जाते हैं |