मनुष्य को धन का घमंड नहीं होना चाहिए| धन का घमंड मनुष्य को खोखला बना देता है|व्यक्ति स्वयं को धनि समझता है किन्तु क्या वास्तव में वो धनी है,?नहीं क्योकि उस व्यक्ति से बढ़ कर भी धनी व्यक्ति हैं|जिस प्रकार संध्याकाल में जब जुगनू उड़ता है तो वह यह समझता है कि इस संसार को वो ही प्रकाश दे रहा है किन्तु जब आकाश में तारे आते हैं तो जुगनुओं का घमंड शांत हो जाता है| तब ये तारे समझते है कि वो संसार को प्रकाश दे रहें हैं, परन्तु उनका गर्व तब टूटता है जब चंद्रमा उदय होता है, चन्द्रमा के उदय होने पर नक्षत्र लज्जित हो जाते है, फिर चन्द्रमा ये सोचता है कि संसार को प्रकाश देने वाला मात्र मैं ही हूँ ,मेरा प्रकाश पा कर ही संसार चल रहा है| उसके सोचते सोचते ही अरुणोदय होता है, तब चन्द्रमा मलिन पड़ने लगता है, और उसे अहसास हो जाता है कि प्रकाश देने वाला वास्तविकता में कोई और है| इसी प्रकार यदि मनुष्य को यह ज्ञान हो जाये कि उससे भी आगे कोई है तो शायद वो थोडा धनि हो जाये| धन से मनुष्य धनि नहीं होता मनुष्य का ज़ज्बा,उसकी इंसानियत,नीयत ही असली धन है|
रविवार, 3 जनवरी 2010
शनिवार, 2 जनवरी 2010
संकष्ट चतुर्थी व्रत
माघ कृष्ण पक्ष कि चतुर्थी को 'संकष्टव्रत' कहा गया है| उस दिन प्रातःकाल स्नान के अनन्तर देवदेव गजमुख की प्रसन्नता के लिए व्रत उपवास का संकल्प कर के दिनभर सीमित रहकर श्री गणेश का स्मरण,चिंतन, एवम भजन करते रहना चाहिए|चंद्रोदय होने पर मिटटी के गणेश मूर्ति बना कर याफिर सुपारी के गणपति रखकर पूजा करनी चाहिए|गणेशजी के साथ उनके आयुध और वहन भी होने चाहिए| सर्वप्रथम उक्त मूर्ति की स्थापना करें; तदन्तर षोडशोपचार से उनका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए| फिर मोदक,तथा गुड में बने हुए तिल के लड्डू का भोग अर्पित करें| आचमन कराकर प्रदक्षिणा और नमस्कार करके पुष्पान्ज्जली अर्पित करनी चाहिए|
तदनन्तर शांतचित्त से भक्तिपूर्वक गणेश मन्त्र का २१ बार जप करें, और फिर भगवान गणेश को अर्घ्य दें|तत्पश्चात चंद्रमा गंध पुष्पादि से विधिवत पूजन करके तांबे के पत्र में लाल चंदन, कुश, दूर्वा, फुल, अक्षत ,शमीपत्र, दधि, और जल एकत्र करके अर्घ्य दें| फिर ईश्वर को प्रणाम करें|
माघ गणेश चतुर्थी
शिवपुराण की कथा है- श्वेतकल्प में जब भगवान शंकर के अमोघ त्रिशूल से पार्वती नंदन का मस्तक कट गया तब पार्वती जी दुखी एवम क्रोधित हो कर बहुत से शक्तियों को उत्पन्न कर प्रलय मचने का आदेश दे दिया| देवगण में हाहाकार मच गया| तब समस्त देवताओं ने माँ को प्रसन्न करने के लिए उत्तर दिशा से हाथी का सिर ला कर शिव पुत्र के धड से जोड़ दिया, महेश्वर के तेज से पार्वती पुत्र जीवित हो गए| माँ पार्वती की प्रसन्नता आसीम थी, देवाधिदेव महादेव एवम माँ पार्वती ने गणपति जी को 'सर्वाध्यक्ष' घोषित किया, महादेव् ने यह वरदान प्रदान किया कि 'विघन्नाश के कार्य में पुत्र तुम्हारा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा, गणपति के पूजन के बिना पूजा अधूरी, होगी|
गणपति के लिए चतुर्थी का व्रत करने वालों की मनोकामना कि पूर्ति होगी|माघमास कि कृष्ण चतुर्थी का विशेष महत्व है, इसे संतान के लिए रखा जाता है| पहले लोगों का यह मानना था कि यह उपवास लडको के लिए होता है, किन्तु आज के बदलते युग में इसे संतान के लिए कहना उचित होगा|इस दिन महिलाये प्रातः काल से निर्जल उपवास रहतीं हैं, सायकल चन्द्रमा के निकलने पर पूजा करती है| पूजा के प्रवधान में तिल का पहाड़ बनाया जाता है, तिल के लड्डू, गन्ना, फल, इत्यादि समान रखा जाता है|सुपारी को गणपति का रूप देते है, पहली बार जिस सुपारी को रख कर पूजा करते है,उसी सुपारी को हमेशा इस्तेमाल करते हैं|इस पूजा में मुख्यतः तिल से ही पूजा होती है, चंद्रमा के अर्घ में भी अक्षत फूल एवम तिल पड़ता है|
गणेश जी कि पूजा सर्वोपरी है|
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