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Hmarivani
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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
अब पत्र लिखने का जमाना तो गया ...........
आज का युग वैज्ञानिक युग है जहाँ हम कागज कलम पर लिखना नहीं चाहते|बच्चों को जब भाषा के तहत पत्र लिखना पड़ता है तो उनके पसीने टपकते है,फिर रटा कर लिखना पड़ता है|अभी एक दिन मुझे अपने माता पिता की बहुत याद आया रही थी शायद उनके रहते इतनी याद ना आई होगी जितना उनके ना रहने पर याद सताती है तो मैने अपने पुराने कागज निकाले जहाँ मेरे शादी के बाद मेरे पिता द्वारा भेजे कुछ पत्र मुझे मिल गए साथ ही मेरी माँ के भी कुछ पत्र मिले मैं उन पत्रों को अपने कलेजे से लगा कर यही सोच रही थी कि ये तो दो चार पत्र मुझे मिल गए इसे मै हमेशा अपने से चिपका कर रखूगीं किन्तु आज इस बदलते युग में अब तोसब फोन पर बात करते है,वेब कैम पर बात होती है, लोग पत्र भी लिखते है तो इ मेल के जरिये|यदि किसी कि लिखावट रखना हो तो क्या हमें मिल पायेगा?
अभी हम जब संग्राहलय में जाते है तो गाँधी, नेहरु के लिखे पत्र किताबें मिलती है किन्तु आगे संग्राहलयों में सबके कम्पुटर ही देखने को मिलेगे जिन्हें संग्राहलयों सम्भाल कर रखा जायेगा....आज हम लिखना भूल रहें हैं, पोस्टकार्ड, अंतर्देशी ,बच्चों को पता ही नहीं होता कि ये किस चिड़िया का नाम है|पोस्टमैन का अब कौन इंतजार करता है?डाकिया डाक लाया कि जगह अब कहा जायेगा देखो मेल सन्देश लाया.या फिर देखो फोन आया .......फोन से मुझे याद आया मै मेरी माँ से रात को बात किया एवम सुबह खबर आई कि वो इस दुनिया में नहीं रही, इस बात के दस वर्ष हो गए मैं उस दिन का सोचती हूँ जब मैने आखिरी बार बात किया था कि मैने माँ से क्या क्या कहा था किन्तु एक दो वाक्य के आगे याद नहीं आता क्योकि मैने ये नहीं सोचा था कि मैं आखिरी बार बात कर रही हूँ वहीँ जो पुराने पत्र रखें हैं वो आज भी बीती बातों कि याद ताज़ा कराते है| पत्र लिखना भी एक कला होती है जो आज के बच्चे भूलते जा रहे है|क्योकि आज का युग पूरी तरह से फोन पर अटक गया है |लिखने में कौन समय गवाए चलो फोन पर बात कर लेते है | इसलिए अपनी बात पन्नो पर कोई भी नहीं उतरना चाहता |किन्तु मुझे ऐसा लगता है कि स्कूल कालेजों में एक बार फिर पत्र लिखने का अभियान चलाना चाहिए,जिससे बच्चों को लिखने कि जागरूकता आये खासतौर से अंग्रेजी माध्यम से पढने वाले बच्चों को ये मालूम हो कि डाक ,डाकिया और डाकखाना क्या होता है|अपनी मन कि बात खत के जरिये कैसे उतरा जाता है|ख़ैर...ये तो मेरे मन कि बात थी कि पत्र लिखना कितना जरूरी है,यादे इससे ताज़ा रहती है लेकिन सबका सोचना अलग होता है किन्तु फिर भी मैं यही कहूँगी कि पत्र के अपने बहुत महत्त्व होते है..... हम मेल और एस ऍम एस में किसी के हाथ कि लिखावट को नहीं पा सकेगे|
बहुत खूब , जिस तरह आपने अपनी बेबाक राय रखी देखने लायक है , आपसे पूर्णतया सहमत हूँ, अगर इसि तरह सब चलता रहा तो हम बहुत कुछ जल्द ही खो देंगे ।
जवाब देंहटाएंआगे से बच्चे माँ बाप के ब्लॉग पोस्ट और ईमेल का प्रिंट सीने से चिपकायेंगे...
जवाब देंहटाएंnice
जवाब देंहटाएंअब पत्रों की जगह ई-मेल है फेसबुक है एसएमएस है। तमाम तरह की तकनीकें हैं।
जवाब देंहटाएंlikha atisundar ab hum logo ko hi patra likhne ki shuruaat karni hogi...........
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