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रविवार, 14 फ़रवरी 2010

वेलेंटाइन दिवस केवल 14 फ़रवरी को ही क्यों ?

  १४ फ़रवरी को   वेलेंटाइन दिवस क्यों मनाया जाता है? क्योंकि सन  1400 से 14 फरवरी को यह इग्लैंड में  मनाया  जाता  रहा है|धीरे धीरे इसने  सब जगह अलग अलग रूप  ले लिया|अब मेरे दिल में केवल एक प्रश्न उठता है कि क्या हमें प्रेम का इज़हार केवल एक दिन १४ फ़रवरी को ही करना चाहिए या हमेशा बरक़रार  रखना चाहिए|आज हमारे समाज में वैवाहिक जीवन में इतनी कडुवाहट भर चुकी है कि वो चाहे प्रेम विवाह हो या फिर माता पिता का सुझाया विवाह हो - कुछ दिन बाद सब एक बराबर हो जाता है |
हम आजकल प्रत्येक चीज़ कि नकल करते हैं सो हमने इसका भी नकल कर लिया|इस वेलेंटाइन दिवस से काफी लोगों का फायदा भी होता है, जैसे कार्ड बनाने वालो का, गुलाब के फूल बेचने वालों का, नेताओं का ,मिडिया का, और सबसे बड़ा फायदा होता है उन लोगों का जो हमेशा झगडे में विश्वास रखते है, और इस दिन एक गुलाब का फूल या फिर एक गुलदस्ते को दे कर सारा साल फिर झगड़े कि ठान लेते है| क्या  यही सच्चा प्यार है? 
यदि मुझे इसे परिभाषित करने को कहा जाये तो मैं यही कहूंगी कि वर्ष के 365 दिन ही वेलेंटाइन दिवस होने चाहिए प्रत्येक दिन  ही गुलाब के फूल के भांति खिले होने चाहिए|दोनों को आपस में विश्वास एवम समझदारी होनी चाहिए| आज के युग में मनाये जाने वाले इस  वेलेंटाइन दिवस को हमें ऐसा मनाना चाहिए जिससे खुशियाँ मिले केवल हम एक ही दिन पर क्यों निर्भर रहते है.क्या बाकि दिनप्रेम के इज़हार का दिवस नहीं होता|और दूसरे नजरिये से अगर हम देखें तो ठीक भी है कि चलो कम से कम एक दिन तो प्यार का इज़हार कर लो बाकि के 364 दिन का तो पता नहीं?
मैं आखिरी में एक ही चीज़ दोहराना चाहूंगी कि हमे हमेशा वेलेंटाइन दिवस मनाना चाहिए नाकि केवल 14 फ़रवरी को केवल |किन्तु मेरे अकेले के सोचने से क्या होगा??????

3 टिप्‍पणियां:

  1. वैलेंटाईन डे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एक "माल बेचू " प्रोपगंडा के सिवा कुछ नहीं.

    रोटी, कपडा, मकान के बाद जीवन की सबसे अनिवार्य आवश्यकता प्रेम ही है. फिर क्या प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दिन मुक़र्रर होना चाहिए?

    क्या भारत में इस तथाकथित "त्यौहार" के आगमन से पहले युवक-युवतियां प्रेम नहीं करते थे??

    बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रायोजित मीडिया दुष्प्रचार क्या इसे सिर्फ युवक - युवतियों के यौनाचार के रूप में पेश नहीं करता?

    टेलीविजन पर यह भौंडा माल बेचू दुष्प्रचार मासूम बच्चों से उनका बचपन छीनकर उन्हें समय से पहले यौन जिज्ञासाओं और कुचेष्टाओं की ओर नहीं धकेल रहा?

    यदि इन प्रश्नों का उत्तर "हाँ" है तो यह पर्व नहीं बल्कि सामाजिक विद्रूपता फैलाने का सिर्फ एक कुत्सित प्रयास है जिससे फ़ायदा सिर्फ इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होने वाला है जबकि इसके दुष्परिणाम पूरे देश और समाज को भुगतने पड़ेंगे.

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  2. बहुत सुन्दर भाव और विचार .. बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. आपका कहना सही है -
    "मेरे अकेले के सोचने से क्या होगा?"
    पर यह भी सही है -
    किसी बात के बारे में पहले
    कोई एक व्यक्ति ही सोचता है!

    --
    कह रहीं बालियाँ गेहूँ की - "वसंत फिर आता है - मेरे लिए,
    नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा! "
    --
    संपादक : सरस पायस

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