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मंगलवार, 26 जनवरी 2010

कोचिंग पुराण


आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है|प्रत्येक ओर होड़ मची है, लोग लम्बे रेस के घोड़े की तरह दौड़ रहे है|इसके लिए तकरीबन नब्बे प्रतिशत बच्चे कोचिंग की तरफ भाग रहें है|अध्यापक भी कोचिंग में ज्यादा रूचि दिखाते है, क्योकि मोटी कमाई वहीँ होती है| आज प्रत्येक जगह पर एक कोचिंग का बोर्ड मिल जायेगा|
अब ये सवाल उठता है कोचिंग किस क्लास के लिए है?तो भाई अब आप लिस्ट देखिये|शुरुआत होती है नर्सरी क्लास से...यहाँ अच्छे विद्यालय में प्रवेश पाने के लिए कोचिंग शुरू हो जाती है| बच्चे को ढाई से तीन वर्ष  की उम्र में कोचिंग क्लास में डाल दिया| ताकि उसे प्रवेश मिल जाये| चलो येन  तेन  किसी प्रकार से एडमिशन मिल गया तो अब बारी आई पढाई की| अब माताएं स्वयं तो पढ़ी लिखी है किन्तु बच्चों को भेज दिया ट्यूशन में, अब समझ में ये नहीं आता की कक्षा नर्सरी से कक्षा पांच तक क्या घर में नहीं पढ़ाया जा सकता|फिर दूसरा प्रश्न यह उठता है की हम ये आदत क्यों नहीं डालते की यदि तुम्हें कोई चीज़ नहीं समझ आती तो आप विद्यालय के अध्यापक से समझो और पहले स्वयं समझने की कोशिश करो साथ ही माता पिता का ये कर्त्तव्य  है कि वो उनको समझाए वक्त दें |अपनी शिक्षा का प्रयोग करे स्वयं शिक्षित है इसका अहसास रखें|यदि घर में लोग अशिक्षित है तो बाहर से सहारा लेना  समझ में आता है किन्तु  स्वयं शिक्षित हो होकर बाहर ट्यूशन भेजना थोडा गले के नीचे बात नहीं उतरती|

अभी ये पुराण यहीं नहीं समाप्त होता, बच्चे दसवीं के लिए जी तोड़ मेहनत करते है वो भी प्रत्येक विषय के लिए कोचिंग जा कर रट रटा कर ज्ञान चाहे विषय का रत्ती भर भी न हो किन्तु नब्बे प्रतिशत कि होड़ में बच्चा खड़ा हो जाता है| दसवीं पास करते ही कैरियर का बोझ उस पर आजाता है| आज कि जानता भागती है आई आई टी की ओर इसके लिए एक और कोचिंग...इसके लिए आजकल लोग बंसल कोटा बच्चों को भेजना चाहते है| अब बंसल कोटा कोचिंग संसथान में एडमिशन हो इसके लिए वहाँ एक और कोचिंग है जो आपको बंसल में एडमिशन का दावा रखती है|अब बंसल कोटा ने अपने ब्रांच खोल दिए है उसमें भी मारामारी |अब प्रश्न ये उठता है की जितने भी ये कोचिंग संस्था ऊँची उठी  है वो क्या बिल्डिंग से ऊँची उठी है या फिर विद्यार्थियों से?


जी हाँ , विद्यार्थियों से ही विद्यालय, कोचिंग सभी की शोभा बढती है|ये विद्यार्थी परिश्रम करते है तभी आगे बढ़ते है| अतः ये हमें सोचने को मजबूर करता है कि हम जीवन में कब तक इन कोचिंग पर आश्रित रहेगे ?हम बच्चों को उनके पैर पर खड़ा होना क्यों नहीं सिखाते |आज अंक कि इतनी मारामारी क्यों है? क्योकि हमें संतोष नहीं है| यदि बच्चा स्वयं आगे बढ़े तो उसका विकास ज्यादा होगा नहीं तो कोचिंग का रटा रटाया ही उसे ज्ञान प्राप्त होगा |किन्तु एक बार फिर वही मुद्दा मै दोहराना चाहुगी कि ये कोचिंग कभी कम होगी कि नहीं क्योकि बच्चों का शारीरिक विकास इससे प्रभावित होता जा रहा है|

3 टिप्‍पणियां:

  1. शिक्षा के नाम पर सब दूहने का कार्यक्रम है....अब तो लोग इसके अभ्यस्त से हो गये हैं....इस चक्र से निकल पाना फिलहाल संभव नहीं दिख रहा है....वैसे आपकी चिंता जायज है

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  2. वास्‍तव में जब तक अभिभावक समझते रहेंगे कि किसी खास स्‍कूल या कॉलेज में दाखिला लेने से ही उनके बेटे का भविष्‍य सुधर सकता है .. कोचिंग का महत्‍व बना रहेगा .. जैसे ही अभिभावक समझ लें कि अनके बेटे का विकास किसी स्‍कूल या कॉलेज की मुहंताज नहीं .. प्रतिभा है तो उसका फायदा मिलना ही है .. कोचिंग को मुंहतोड जबाब होगा .. पर इसके लिए अभिभावकों को एकजुट होना होगा .. जो फिलहाल नहीं दिखता है !!

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  3. गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें....

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