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गुरुवार, 21 जनवरी 2010

कर्मफल


पाप और पाराकोई नहीं पचा सकता

यदि कोई छिपाकर पारा कहा ले, तो किसी न किसी दिन वह शरीर से फूट कर निकलेगा|
पाप करने से उसका फल एक न एक दिन निश्चय ही भोगना पड़ेगा|
रेशम के कीड़े जैसे अपनी लार से अपना घर बनाकर आप ही उसमें फंसता है, वैसे ही संसार के जीव भी अपने कर्मपार्ष में आप ही फंसते है|
जब वे रेशम के कीड़े तितली बन जाते है, तब घर को काटकर निकाल आते हैं; इसी प्रकार विवेक और वैराग्य के उदय होने पर बढ़ जीव भी मुक्त हो जाते हैं|
इसी प्रकार एक बार एक महात्मा को लगा कि लोग कहते हैं गंगा स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं यदि ऐसा होता है तो पाप कैसे रुकेगा, ये सोच कर वो महात्मा गंगाजी के पास ये प्रश्न ले कर गए
उन्होंने गंगा जी से ये प्रश्न पूछा कि लोग कहते हैं कि आप का स्नान करने के पश्चात सारे पाप धुल जाते है तो क्या आप सारे पाप को रखती हैं|
गंगाजी ने हंस कर उत्तर दिया कि नहीं मैं तो जा कर समुद्र में मिलती हूँ इस प्रश्न का जवाब तो समुद्रदेव ही दे सकते है|
महात्माजी समुद्र देव के पास गये एवम ये प्रश्न दोहराया तो समुद्रदेव ने गंभीरता से जवाब दिया जिस प्रकार गंगाजी मुझमें मिलती है और सारा पाप यहाँ आता है उसी प्रकार मुझसे ही बादल बनता है तो सारा पाप उधर जाता है, आप बादल से पूछ लो
महात्माजी कि उत्सुकता और तीव्र हुयी और उन्होंने बादल से पूछा कि क्या आप के पास सारे पाप आते हैं|
तब बादल ने जवाब दिया कि नहीं जैसे सबके पास से पाप हमारे पास आता हैं वैसे ही मैं फिर से उनके घर आंगन में बरसा देता हूँ|
अतः जिसका पाप है दंड उसी को भोगना है प्रयाश्चित भी उसे ही करना है|

कहने का तात्पर्य ये है कि हम जैसा करते है हमें फल वैसा ही प्राप्त होता है|
गंगा स्नान या फिर पूजा पाठ से पाप धुलता या काम नहीं होता किसी न किसी रूप में हमें दंड मिलता ही है|










2 टिप्‍पणियां:

  1. हम जैसा करते है हमें फल वैसा ही प्राप्त होता है|
    गंगा स्नान या फिर पूजा पाठ से पाप धुलता या काम नहीं होता किसी न किसी रूप में हमें दंड मिलता ही है|
    शास्वत सच है सभी जानते है लेकिन मानते नहीं.
    शिक्षाप्रद आलेख के लिए धन्यवाद्.

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